SECL : अखिल भारतीय कोयला खदान मजदूर संघ ने बिलासपुर मुख्यालय में सौंपा ज्ञापन

SECL : 17 सूत्रीय मांगों को लेकर गूंजे नारे, प्रबंधन को सौंपा गया पत्र

बिलासपुर। अखिल भारतीय खदान मजदूर संघ के आह्वान पर 12 सितंबर को देशभर के कोयला उद्योगों के क्षेत्रीय मुख्यालयों में धरना-प्रदर्शन और ज्ञापन सौंपने का कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसी क्रम में दक्षिण पूर्वी कोलफील्ड्स लिमिटेड (SECL) मुख्यालय, बिलासपुर में बड़ी संख्या में पदाधिकारी, कार्यकर्ता और ठेका श्रमिक एकत्रित हुए। गेट के सामने जोरदार नारेबाजी और विरोध-प्रदर्शन के बीच संगठन ने केंद्रीय कोयला मंत्री और कोल सचिव के नाम 17 सूत्रीय मांग पत्र सौंपा।

संघ की प्रमुख मांगों में खदान कर्मियों के लिए मूलभूत सुविधाओं की गारंटी, उत्पादन लक्ष्य की होड़ में सुरक्षा और पर्यावरणीय मानकों की अनदेखी पर रोक, आउटसोर्सिंग नीति पर नियंत्रण, ठेका श्रमिकों को हाई पावर कमेटी द्वारा तय वेतन व सामाजिक सुरक्षा लाभ दिलाना शामिल है। इसके अलावा भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन, पेंशन-आवास सुविधा, सिविल कार्यों में पारदर्शिता और श्रमिक संगठनों के साथ नियमित बैठकें आयोजित करने की भी मांग की गई।

इस मौके पर शाखा अध्यक्ष गौरव सिंह, सचिव शंखध्वनि सिंह बनाफर, कार्यकारी अध्यक्ष अजय सिंह, कोषाध्यक्ष सुनील राठौर, संचालन समिति सदस्य गिरजाशंकर आचार्य, आवास समिति सदस्य अनिल दिघ्रस्कर, पूर्व अध्यक्ष अरुण सोनी, अजय दास गुप्ता, शिवेंद्र सिंह, राय चौधरी, शिव साहू, पुरषोत्तम गुप्ता, पूर्व सचिव संदीप बल्लाल समेत कई पदाधिकारी और श्रमिक मौजूद रहे।

कार्यक्रम के अंत में प्रबंधन की ओर से वरिष्ठ प्रबंधक अनंत मिश्रा और प्रबंधक अरुण कुमार ने ज्ञापन ग्रहण किया। भारतीय मजदूर संघ छत्तीसगढ़ के कार्यकारी अध्यक्ष एवं मुख्यालय शाखा सचिव शंखध्वनि सिंह बनाफर ने चेतावनी दी कि यदि मांगों पर शीघ्र निर्णय नहीं लिया गया, तो आंदोलन को कंपनी स्तर से बढ़ाकर कोल इंडिया स्तर तक ले जाया जाएगा।

भले ही जेल जाना पड़े, लेकिन रावण दहन वहीं करेंगे”अरपांचल लोक मंच अध्यक्ष सिद्धांशु मिश्रा का प्रशासन को खुला चैलेंज

बिलासपुर। बिलासपुर छत्तीसगढ़ की न्यायधानी में इस बार दशहरा पर्व पर रावण दहन को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। सरकंडा स्थित साइंस कॉलेज मैदान, जो अब तक अरपांचल लोक मंच समिति के आयोजनों का केंद्र रहा है, वहां इस बार प्रशासन ने किसी और को परमिशन दे दी है। इसी फैसले के बाद मंच के पदाधिकारी भड़क गए हैं और उन्होंने इसे “द्वेषपूर्ण व दबाव की राजनीति” करार दिया है।

अरपांचल लोक मंच समिति के अध्यक्ष सिद्धांशु मिश्रा ने सोमवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए, मिश्रा ने कहा कि मंच कई वर्षों से साइंस कॉलेज मैदान में रावण दहन सहित सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करता आ रहा है, लेकिन इस बार अचानक से मैदान का आवंटन सिद्धार्थ भारती नामक व्यक्ति को कर दिया गया।

मिश्रा का कहना है कि मंच ने समय रहते आवेदन किया था, फिर भी कॉलेज प्रबंधन और प्रशासन ने दूसरे आवेदन को स्वीकार किया। उन्होंने आरोप लगाया कि “प्रशासन और पुलिस दबाव में काम कर रही है और दबाव डालने वाला चेहरा जल्द ही सामने लाया जाएगा।”

सिद्धांशु मिश्रा ने स्पष्ट कहा कि “भले ही जेल जाना पड़े, लेकिन रावण दहन वहीं होगा। हम प्रशासन की एकतरफा कार्रवाई को स्वीकार नहीं करेंगे। आवश्यकता पड़ी तो न्यायालय का दरवाजा खटखटाएंगे और बेलतरा विधायक सुशांत शुक्ला से भी मुलाकात करेंगे।”

अरपांचल लोक मंच समिति ने यह भी सवाल उठाया कि जब एक आवेदन पहले से लिया गया था तो कॉलेज प्रबंधन ने दूसरा आवेदन क्यों स्वीकार किया? मिश्रा ने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन बताया और चेतावनी दी कि अगर प्रशासन अपने निर्णय पर अडिग रहा तो संघर्ष तेज होगा।

अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस विवादित हालात में क्या रुख अपनाता है,क्या परंपरा को जारी रखते हुए अरपांचल लोक मंच को अनुमति देगा, या इस बार मैदान में किसी नए आयोजनकर्ता को बढ़त मिलेगी।

Sarathi Samaj Social Conference : व्यक्ति जन्म से नहीं कर्म से महान होता है – त्रिलोक

Sarathi Samaj Social Conference : बिलासपुर में सहीस सारथी समाज का भव्य सामाजिक सम्मेलन साई मंगलम रमतला में संपन्न हुआ। इस आयोजन में छत्तीसगढ़ प्रदेश भर से हजारों लोगों ने हिस्सा लिया। मुख्य अतिथि कांग्रेस नेता त्रिलोक चंद्र श्रीवास ने कहा कि समाज की प्रगति शिक्षा और शासकीय योजनाओं के बेहतर उपयोग से संभव है।

सहीस सारथी समाज सम्मेलन बिलासपुर 2025
         सहीस सारथी समाज सम्मेलन बिलासपुर 2025

बिलासपुर l कोई व्यक्ति जन्म से छोटा नहीं होता जन्म से सभी व्यक्ति एक समान होते हैं, कर्म और आचरण से व्यक्ति बड़ा होता है, मनुष्यों के सिर्फ एक जाती है वह मानव जाति है, भगवान ने एक ही जाती बनाया है मानव जाति एक समाज बनाया है मानव समाज बनाया है, सनातन संस्कृति में कोई भी जाती छोटी नहीं है, ना कोई व्यक्ति छोटा है, जो हीन भावना से ग्रसित होता है वह दूसरे व्यक्ति या जाति को छोटे रूप से देखता है, या उनके छोटे रूप में आकलन करता है, सारथी समाज भगवान श्री कृष्ण महाभारत में अर्जुन के सारथी बन गए थे, तो कर्म से कुछ समय के लिए भगवान भी योगेश्वर कृष्ण भी सारथी हुए, हर समाज का वैभवशाली इतिहास रहा है समाज के लोगों को बच्चों को युवाओं शिक्षित बनाकर शासकीय योजनाओं को अपनाकर समाज को उत्तरोत्तर प्रगति करना है, यह बातें बिलासपुर जिले के लोकप्रिय कांग्रेस नेता त्रिलोक चंद्र श्रीवास ने सहीस सारथी समाज के सामाजिक सम्मेलन में मुख्य अतिथि के हैसियत के व्यक्त किया, सहिस सारथी समाज का सामाजिक सम्मेलन साई मंगलम रमतला मैं संपन्न हुआ, जिसमें बेल्थरा बिलासपुर सहित पूरे छत्तीसगढ़ प्रांत के हजारों लोग सम्मिलित हुए, इस अवसर पर श्री त्रिलोक श्रीवास् ने कहा कि वह सारथी समाज के हर सुख- दुख में भागीदार बनते आ रहे हैं, भविष्य में भी उनको समाज के लिए कुछ योगदान करने पर गौरवांवित महसूस होगा, इस अवसर पर सारथी समाज के बिलासपुर जिले से पूरे प्रदेश से आए प सामाजिक बंधु, बहने हजारों की संख्या में उपस्थित थे, जिसमें प्रमुख रूप से डॉक्टर प्रेमलाल सारथी, रोशन सागर, गुलाब नागेन्द्र, गुलाब डोंगरे, छोटेलाल सागर कीर्ति सागर तुलाराम कुलदीप लखन लाल सहिस कृष्ण सागर रोहन सागर जय सारथी रामनारायण साहनी शिव कुमार सागर किशोर सागर विनोद सागर संतोष सागर सीमा सागर रामवती बाई लता सारथी, राहुल श्रीवास दुर्गेश पटेल, पार्थ किशन सहित सारथी समाज के हजारों लोग उपस्थित थे l

संस्कृत भारतीय संस्कृति की आत्मा है, इसे नई पीढ़ी तक पहुँचाना होगा : CM साय

Sanskrit Vidwat Sammelan Raipur : CM विष्णुदेव साय ने कहा कि संस्कृत भारतीय संस्कृति की आत्मा है और इसे नई पीढ़ी तक पहुँचाना हमारी जिम्मेदारी है। उन्होंने जोर दिया कि आधुनिक शिक्षा में भी संस्कृत प्रासंगिक है और इसका संरक्षण आने वाली पीढ़ियों के लिए आवश्यक है।

रायपुर। भारतीय संस्कृति की आत्मा संस्कृत में निहित है, जो हमें विश्व पटल पर एक विशिष्ट पहचान प्रदान करती है। संस्कृत भाषा व्याकरण, दर्शन और विज्ञान की नींव है, जो तार्किक चिंतन को बढ़ावा देती है। CM विष्णुदेव साय ने आज राजधानी रायपुर के संजय नगर स्थित सरयूपारीण ब्राह्मण सभा भवन में आयोजित विराट संस्कृत विद्वत्-सम्मेलन को संबोधित करते हुए यह बात कही।

मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि संस्कृत शिक्षा आधुनिक युग में भी प्रासंगिक और उपयोगी है। संस्कृत भाषा और साहित्य हमारी विरासत का आधार हैं, जिन्हें हमें संरक्षित और संवर्धित करना चाहिए।

मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि देववाणी संस्कृत पर चर्चा के साथ यह सम्मेलन भारतीय संस्कृति, संस्कार और राष्ट्र को सुदृढ़ बनाने का एक महान प्रयास है। मुख्यमंत्री श्री साय ने संस्कृत भाषा के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए संस्कृत भारती छत्तीसगढ़ और सरयूपारीण ब्राह्मण सभा छत्तीसगढ़ द्वारा किए जा रहे प्रयासों की सराहना की तथा उन्हें बधाई और शुभकामनाएँ दीं।

मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि आधुनिक शिक्षा में संस्कृत भाषा को शामिल करने से विद्यार्थियों का बौद्धिक विकास सुनिश्चित होगा। संस्कृत में वेद, उपनिषद और पुराण जैसे ग्रंथों का विशाल भंडार है, जो दर्शन, विज्ञान और जीवन-मूल्यों का संदेश देते हैं। वेदों में वर्णित आयुर्वेद, गणित और ज्योतिष आज भी प्रासंगिक हैं और शोध का विषय हो सकते हैं। इन ग्रंथों में कर्म, ज्ञान और भक्ति के सिद्धांत स्पष्ट रूप से प्रतिपादित हैं, जो आधुनिक जीवन में शांति और संतुलन ला सकते हैं।ऐसे में संस्कृत शिक्षा आधुनिक युग में भी उतनी ही प्रासंगिक और उपयोगी है।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि वेदों और उपनिषदों के ज्ञान को अपनाकर हम अपनी विरासत को संजोने के साथ-साथ अपने जीवन को भी समृद्ध बना सकते हैं। उन्होंने कहा कि हमें युवाओं को संस्कृत साहित्य से जोड़ने के लिए प्रेरित करना होगा, ताकि वे इस ज्ञान को नई पीढ़ी तक पहुँचा सकें।

मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि तकनीक के माध्यम से संस्कृत शिक्षा को आकर्षक और प्रासंगिक बनाया जा सकता है। राज्य में संस्कृत विद्वानों और शिक्षकों की सक्रिय भागीदारी से इस दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकते हैं। उन्होंने आह्वान किया कि इस सम्मेलन के माध्यम से हमें संस्कृत विद्या के प्रचार-प्रसार और अगली पीढ़ी को जोड़ने का संकल्प लेना चाहिए।

कार्यक्रम में मुख्यमंत्री श्री साय ने सरयूपारीण ब्राह्मण सभा, छत्तीसगढ़ के प्रचार पत्रक का विमोचन भी किया। विराट संस्कृत विद्वत्-सम्मेलन का आयोजन संस्कृत भारती छत्तीसगढ़ एवं सरयूपारीण ब्राह्मण सभा छत्तीसगढ़ के संयुक्त तत्वावधान में किया गया।

सम्मेलन को संबोधित करते हुए संस्कृत भारती के प्रांताध्यक्ष डॉ. दादू भाई त्रिपाठी ने कहा कि इतिहास में ऐसे अनेक प्रमाण मिलते हैं, जिनसे सिद्ध होता है कि एक समय संस्कृत जनभाषा के रूप में प्रचलित थी। छत्तीसगढ़ी भाषा का संस्कृत से सीधा संबंध है। छत्तीसगढ़ी में पाणिनि व्याकरण की कई धातुओं का सीधा प्रयोग होता है। उन्होंने यह भी बताया कि सरगुजा क्षेत्र में सर्वाधिक आदिवासी विद्यार्थी संस्कृत की शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।

मुख्यमंत्री श्री साय ने कार्यक्रम में सरयूपारीण ब्राह्मण समाज के विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान देने वाले व्यक्तियों को सम्मानित किया। इनमें गठिया रोग विशेषज्ञ डॉ. अश्लेषा शुक्ला, उत्कृष्ट तैराक अनन्त द्विवेदी तथा पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सच्चिदानंद शुक्ला शामिल थे।

सम्मेलन को दंडी स्वामी डॉ. इंदुभवानंद महाराज, सरयूपारीण ब्राह्मण सभा छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष डॉ. सुरेश शुक्ला और अखिल भारतीय संस्कृत भारती शिक्षण प्रमुख डॉ. श्रीराम महादेव ने भी संबोधित किया। इस अवसर पर डॉ. सतेंद्र सिंह सेंगर, अजय तिवारी, बद्रीप्रसाद गुप्ता सहित बड़ी संख्या में संस्कृत शिक्षकगण, सामाजिक प्रतिनिधि और गणमान्यजन उपस्थित थे।

Teachers day : शिक्षक समाज का सर्जक है, इसलिए सदैव सम्मानीय है – राजेश सूर्यवंशी

Teachers day : बिलासपुर जिले के ग्राम सेमरताल स्थित शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में शिक्षक सम्मान समारोह का भव्य आयोजन किया गया। चंदैनी गोंदा सभागार में हुए इस कार्यक्रम में सेवानिवृत्त शिक्षकों से लेकर नवांकुर शिक्षकों तक को सम्मानित किया गया। विशेषता यह रही कि जिन शिक्षकों ने तीन-तीन पीढ़ियों को शिक्षा दी, आज उनकी चौथी पीढ़ी भी शिक्षक बनकर समाज को ज्ञान दे रही है। समारोह में शिक्षा, साहित्य और समाज के विभिन्न क्षेत्रों से आए अतिथियों ने शिक्षकों के योगदान को सराहा और विद्यालय के विकास के लिए सहयोग की घोषणाएं भी कीं।

बिलासपुर/सेमरताल । शासकीय उच्चतर माध्यमिक विघालय सेमरताल के चंदैनी गोंदा सभागार में शिक्षक सम्मान समारोह का भव्य आयोजन किया गया। ग्राम स्तर के इस आयोजन की भव्यता का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि इस कार्यक्रम में नवांकुर शिक्षकों के साथ ही ऐसे सेवानिवृत्त शिक्षकों को आमंत्रित किया गया, जिन्होंने तीन तीन पीढ़ियों को शिक्षा प्रदान की है। इतना ही नहीं आज उन्हीं शिक्षकों के बच्चे शिक्षक बनकर चैंथी पीढ़ी को भी पढा रहे हैं। सेवानिवृत शिक्षक व सियनहा मंच के संस्थापक रामकुमार वर्मा ऐसे ही शिक्षक हैं, जिनके तीन भाईयों ने शिक्षकीय कार्य किया। वही आज उनके आठ बच्चे प्राथमिक, पूर्व माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक विघालय में शिक्षकीय दायित्व का निर्वहन कर रहे हैं।
सेमरताल में आयोजित शिक्षक सम्मान समारोह के मुख्य अतिथि राजेश सूर्यवंशी, विशिष्ट अतिथि पूर्व संयुक्त संचालक शिक्षा एस. के. प्रसाद, मुख्य अभ्यागत मदन सिंह ठाकुर साहित्यकार व वरिष्ठ पत्रकार थे। मंचासीन समस्त आगंतुको ने माँ सरस्वती एवं डा.सर्वपल्ली राधाकृष्णन के चित्र की पूजा के साथ समारोह का औपचारिक शुरुवात किया। विघालय के बच्चों ने सरस्वती एवं स्वागत वंदन का गीत प्रस्तुत किया। शाला प्रबंधन समिति के अध्यक्ष सुरेन्द्र पाण्डेय, प्राचार्य अनिल वर्मा एवं प्रबंधन समिति के सदस्य एवं आयोजन के संयोजक सतीश धीवर ने पुष्पगुच्छ भेंट कर मंचस्थ अतीथियों का स्वागत किया।
सुरेन्द्र पाण्डेय ने स्वागत भाषण देते हुए कहा कि आज के आयोजन में राजनीति, शिक्षा और साहित्य के क्षेत्रों से अभ्यागत आए हुए हैं। ये महासंगम है। साथ ही गाँव के सभी सेवानिवृत शिक्षकों का आगमन हुआ है, जिनका आज सम्मान कर रहे हैं। ये अवसर है, आज के शिक्षकों के प्रति सम्मान प्रदर्शित करने का। इन्होंने कहा कि हमारे क्षणिक आमंत्रण पर आप सब कार्यक्रम में उपस्थित हुए, ये बड़ी बात है। आप सबका स्वागत है।
मुख्य अतिथि राजेश सूर्यवंशी ने कहा कि शिक्षक का सम्मान हमेंशा होता है। वे कभी सेवानिवृत नहीं होते। शिक्षक अपना पूरा जीवन एक छत के नीचे सिर्फ समाज के लिए सर्वश्रेष्ठ नागरिक सर्जन करने में गुजार देता है। यही कारण है कि वे सदैव सम्मानीय है। राजेश सूर्यवंशी ने विघालय के मैंदान समतलीकरण व नाली निर्माण के लिए दस लाख रुपए प्रदान करने की घोंषणा की।
विशिष्ठ अतिथि एस. के. प्रसाद ने प्राचार्य के रुप में अपने पहले कार्य स्थल सेमरताल को प्रणाम किया। उन्होंने कहा कि ग्रामीण बच्चों को बारहवीं के बाद प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए उचित मार्गदर्शन और किताबों की आवश्यकता होती है। क्यों न हम सब मिलकर स्कूल में एक पुस्तकालय स्थापित करें, जहाँ इस गाँव व आसपास के प्रतिभाशाली बच्चे अच्छे से तैयारी कर सके। इस विघालय के प्राचार्य अनिल वर्मा हैं, जो कि स्थानीय है। उनके पास विघालय के लिए पर्याप्त समय भी है। आगे हम सब पुस्तकालय के लिए तैयारी करेंगे।
मुख्य अभ्यागत मदन सिंह ठाकुर ने बेहतरीन परीक्षा परिणाम के लिए कक्षा पाँचवी की शिक्षक शुभा पाण्डेय, कक्षा आठवीं के शिक्षक प्रदीप मुखर्जी, नमिता बेहार शर्मा, कक्षा दसवीं की शिक्षक शैली यादव और कक्षा बारहवीं की शिक्षक सीमा ठाकुर, रुपाली श्रीवास्तव, पदमा द्विवेदी एवं अदिति दुबे को शाल, श्रीफल, कलम भेंट कर सम्मानित किया। मदन सिंह ने स्वयं का लिखा भक्ति गीत भी प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम के संयोजक सतीष धीवर ने समारोह कहा कि सभी शिक्षक विघालय में मन लगाकर अध्यापन कार्य करें और लगातार शिक्षा का स्तर बढ़ाते रहे।
प्राचार्य अनिल वर्मा ने कार्यक्रम के आयोजनकर्ता सुरेन्द्र पाण्डेय, सतीश धीवर और रामावतार यादव, समन्वयक ओमप्रकाश वर्मा को बधाई देते हुए कहा कि समाज, शासन और विघार्थियों को शिक्षकों से बड़ी अपेक्षाएं रहती है। वहीं शिक्षको के प्रति जो सम्मान का भाव होना चाहिए वह कम दिखाई देता है। सम्मान देने वाले ही सम्मान पाते हैं। ऐसे में शिक्षक सम्मान समारोह आयोजनकर्ता ने एक अच्छी शुरुवात की है।
मंचस्थ अतीथियों ने सेवानिवृत शिक्षकों रामकुमार वर्मा, रामकुमार मरकाम, अनुजराम धीवर, यदुनंदन कौशिक, पनाराम धीवर, रामकुमार मानिकपुरी, द्वासीराम धीवर, प्राचार्य अनिल वर्मा, संकुल समनयक ओमप्रकाश वर्मा, प्रधान पाठक शांति तिर्की एवं प्रधान पाठक इंदिरा कश्यप को शाल, श्रीफल, कलम भेंट कर सम्मानित किया।
तत्पश्चात सुरेन्द्र पाण्डेय, सतीश धीवर, अनिल वर्मा एवं किया। सेवानिवृत्त शिक्षकों ने शासकीय उच्चतर माध्यमिक विघालय के समस्त शिक्षकों का सम्मान श्रीफल, शाल और कलम भेंट कर किया। सम्मान प्राप्त करने वालों में व्याख्याता ज्योति साहू, व्यायाम शिक्षक संदीप त्रिपाठी, शिक्षक कीर्तन बंजारे, अनीता बोरकर, सहायक शिक्षक बीना ठाकुर, शशि श्रीवास्तव, नमिता मिश्रा, भूमिका साहू, राधा टंडन, सरस्वती शिशु मंदिर के प्रधानाचार्य रवीन्द्रनाथ गहवई, पूजा लासरे, सानिया सूर्यवंशी, बलराम बासपेयी, देवशरण भार्गव शामिल थे। शिक्षक सम्मान समारोह का सफल संचालन आचार्य रवीन्द्रनाथ गहवई ने किया। आभार प्रदर्शन सुरेन्द्र पान्डेय ने किया।

ASEAN Bharat Tourism Year 2025: पर्यटन कूटनीति में भारत की बड़ी पहल

ASEAN Bharat Tourism Year 2025 के तहत भारत ने वियतनाम में आयोजित इंटरनेशनल टूरिज्म एक्सपो में आईआरसीटीसी के जरिए अपनी वैश्विक उपस्थिति दर्ज कराई। हो ची मिन्ह सिटी में लगे ASEAN-India Pavilion ने भारत की सांस्कृतिक धरोहर, लक्ज़री ट्रेनों और पर्यटन संभावनाओं को दुनिया के सामने पेश किया।

नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2025 को आसियान-भारत पर्यटन वर्ष घोषित किया है। इस पहल का मकसद भारत और आसियान देशों के बीच सांस्कृतिक, आर्थिक और पर्यटन सहयोग को नई दिशा देना** है। इसी कड़ी में भारतीय रेलवे खानपान एवं पर्यटन निगम (IRCTC) ने वियतनाम के हो ची मिन्ह सिटी में आयोजित इंटरनेशनल टूरिज्म एक्सपो (ITE) वियतनाम 2025 में भारत की भागीदारी को ऐतिहासिक रूप से प्रस्तुत किया।

आसियान-भारत पैवेलियन बना आकर्षण का केंद्र

4 से 6 सितंबर 2025 तक सैगॉन एग्ज़िबिशन एंड कन्वेंशन सेंटर (SECC) में आयोजित इस एक्सपो में आईआरसीटीसी ने एक विशेष आसियान-भारत पैवेलियन स्थापित किया। यहां भारत की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर, वेलनेस टूरिज्म, एडवेंचर पैकेज और विश्वस्तरीय लक्ज़री ट्रेनों को प्रदर्शित किया गया।

  • महाराजा एक्सप्रेस
  • गोल्डन चैरीअट
  • बौद्ध सर्किट लक्ज़री ट्रेन
  • मुख्य आकर्षण रहे।

इस पैवेलियन का उद्घाटन हो ची मिन्ह सिटी में भारतीय महावाणिज्यदूत विप्र पांडेय ने किया।

 भारत-आसियान सहयोग को नई गति

आईआरसीटीसी ने विदेश मंत्रालय के सहयोग से PATA Travel Mart 2025 (बैंकॉक) और थाईलैंड में **रोड शो** आयोजित कर भारत-आसियान पर्यटन साझेदारी को मजबूत किया। इन आयोजनों में भारत और आसियान देशों के पर्यटन क्षेत्र के प्रमुख प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। थाईलैंड में भारत के राजदूत नागेश सिंह के नेतृत्व में इस पहल को और गति मिली।

सामूहिक प्रतिनिधित्व और नई साझेदारी

ITE वियतनाम में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व आईआरसीटीसी कर रहा है, जिसमें राज्य पर्यटन बोर्ड, निजी पर्यटन कंपनियाँ और आसियान देशों के अधिकारी शामिल हैं। इस दौरान भारतीय और वियतनामी ट्रैवल एजेंटों, टूर ऑपरेटरों व नीति निर्माताओं के बीच सीधा संवाद हुआ, जिससे नए व्यावसायिक अवसरों और साझेदारियों का मार्ग खुला।

वैश्विक पर्यटन में भारत की मजबूत पहचान

प्रधानमंत्री की यह घोषणा और आईआरसीटीसी की भागीदारी भारत को वैश्विक पर्यटन गंतव्य** के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण साबित हो रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल न केवल क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को बढ़ाएगी, बल्कि भारत-आसियान देशों के बीच **मित्रता, विश्वास और साझा विकास के नए अध्याय खोलेगी।

 

Bhupen Da Jayanti: पीएम मोदी ने कहा– उनका संगीत भारत की आत्मा की आवाज है

Bhupen Da Jayanti: भारत रत्न और महान गायक डॉ. भूपेन हज़ारिका की जयंती पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भावुक श्रद्धांजलि दी है। उन्होंने कहा कि भूपेन दा का संगीत केवल स्वर नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, एकता और करुणा की आवाज़ है। असम की धरती से निकली यह कालजयी आवाज़ आज भी भारत की सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखे हुए है। मोदी ने याद दिलाया कि भूपेन हज़ारिका ने अपनी रचनाओं से गरीबों, मज़दूरों और आमजन की भावनाओं को स्वर दिया और उनकी प्रतिभा ने पूरे भारत को जोड़ने का काम किया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी – भारतीय संस्कृति और संगीत से लगाव रखने वालों के लिए आज 8 सितंबर का दिन बहुत खास है। और विशेषकर इस दिन के साथ असम के मेरे भाइयों और बहनों की भावनाएं जुड़ी हुई हैं। आज भारत रत्न डॉ. भूपेन हजारिका की जन्म जयंती है। वे भारत की सबसे असाधारण और सबसे भावुक आवाज़ों में से एक थे। ये बहुत सुखद है कि इस वर्ष उनके जन्म शताब्दी वर्ष का आरंभ हो रहा है। यह भारतीय कला-जगत और जन-चेतना की दिशा में उनके महान योगदानों को फिर से याद करने का समय है।
भूपेन दा ने हमें संगीत से कहीं अधिक दिया। उनके संगीत में ऐसी भावनाएं थीं जो धुन से भी आगे जाती थीं। वे केवल एक गायक नहीं थे, वे लोगों की धड़कन थे। कई पीढ़ियां उनके गीत सुनते हुए बड़ी हुईं। उनके गीतों में हमेशा करुणा, सामाजिक न्याय, एकता और गहरी आत्मीयता की गूंज है।
भूपेन दा के रूप में असम से एक ऐसी आवाज़ निकली जो किसी कालजयी नदी की तरह बहती रही। भूपेन दा सशरीर हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी आवाज आज भी हमारे बीच है। वो आवाज आज भी सीमाओं और संस्कृतियों से परे है। उसमें मानवता का स्पर्श है।
भूपेन दा ने दुनिया का भ्रमण किया, समाज के हर वर्ग के लोगों से मिले, लेकिन वे असम में अपनी जड़ों से हमेशा जुड़े रहे। असम की समृद्ध मौखिक परंपराएं, लोकधुनें और सामुदायिक कहानी कहने के तरीकों ने उनके बचपन को गढ़ा। यही अनुभव उनकी कलात्मक भाषा की नींव बने। वे असम की आदिवासी पहचान और लोगों के सरोकार को हर समय साथ लेकर चले।
बहुत छोटी उम्र से उनकी प्रतिभा लोगों को नजर आने लगी। केवल पांच वर्ष की उम्र में उन्होंने सार्वजनिक मंच पर गाया। वहां लक्ष्मीनाथ बेझबरुआ जैसे असमिया साहित्य के अग्रदूत ने उनके कौशल को पहचाना। किशोरावस्था तक पहुंचते-पहुंचते उन्होंने अपना पहला गीत रिकॉर्ड कर लिया।
लेकिन संगीत उनके व्यक्तित्व का सिर्फ एक पहलू था। भूपेन दा भीतर से एक बौद्धिक व्यक्तित्व थे। जिज्ञासु, साफ बोलने वाले, दुनिया को समझने की अटूट चाह रखने वाले। ज्योति प्रसाद अग्रवाला और विष्णु प्रसाद रभा जैसे सांस्कृतिक दिग्गजों ने उनके मन पर गहरा प्रभाव डाला, और उनकी जिज्ञासु प्रवृत्ति को और बढ़ावा दिया।
सीखने की यही लगन उन्हें कॉटन कॉलेज, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय तक ले गई। वो बीएचयू में राजनीति शास्त्र के छात्र थे, लेकिन उनका अधिकतर समय संगीत साधना में बीतता था। बनारस ने उन्हें पूरी तरह संगीत की तरफ मोड़ दिया। काशी का सांसद होने के नाते मैं उनकी जीवन यात्रा से एक जुड़ाव महसूस करता हूऔर मुझे बहुत गर्व होता है।
काशी से आगे बढ़ी जीवन यात्रा में फिर उन्होंने अमेरिका में कुछ समय बिताया। वहां उन्होंने अपने समय के नामचीन विद्वानों, विचारकों और संगीतकारों से संवाद किया। वे पॉल रोबसन से मिले, जो दिग्गज कलाकार और सिविल राइट्स नेता थे। रोबसन का गीत “Ol’ Man River” उनके कालजयी गीत ‘बिश्टीरनो परोरे’ की प्रेरणा बना। अमेरिका की पूर्व प्रथम महिला एलेनॉर रूजवेल्ट ने भारतीय लोकसंगीत प्रस्तुतियों के लिए उन्हें गोल्ड मेडल भी दिया।
भूपेन हजारिका, संगीत के साथ ही मां भारती के भी सच्चे उपासक थे। भूपेन दा के पास अमेरिका में रहने का विकल्प था, लेकिन वे भारत लौट आए और संगीत साधना में डूब गए। रेडियो से लेकर रंगमंच तक, फिल्मों से लेकर एजुकेशनल डॉक्यूमेंट्री तक, हर माध्यम में वे पारंगत थे। जहां भी गए, नई प्रतिभाओं को समर्थन दिया।
भूपेन दा की रचनाएं काव्यात्मक सौंदर्य से भरी रहीं, और साथ-साथ उन्होंने सामाजिक संदेश भी दिए। गरीबों को न्याय, ग्रामीण विकास, आम नागरिक की ताकत, ऐसे अनेक विषय उन्होंने उठाए। उनके गीतों ने नाविकों, चाय बागान के मजदूरों, महिलाओं, किसानों की आकांक्षाओं को आवाज़ दी। उनकी रचनाएं लोगों को पुरानी स्मृतियों में ले जाती थीं, साथ ही, उन्होंने आधुनिकता को देखने का एक सशक्त नजरिया भी दिया। बहुत से लोग, खासकर सामाजिक रूप से वंचित तबकों के लोग, उनके संगीत से शक्ति और आशा पाते रहे…और आज भी पा रहे हैं।
भूपेन दा की जीवन यात्रा में ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना का स्पष्ट प्रभाव दिखता है। उनकी रचनाओं ने भाषा और क्षेत्र की सीमाएं तोड़कर एकजुट किया। उन्होंने असमिया, बांग्ला और हिन्दी फिल्मों के लिए संगीत रचा। उनकी आवाज में जो पीड़ा थी, वो बरबस हम सभी का ध्यान खींच लेती थी। ‘दिल हूम हूम करे’ में जो पीड़ा बहती है, वो सीधे दिल की गहराइयों को छू लेती है। और जब वे पूछते हैं, ‘गंगा बहती है क्यूं’, तो ऐसा लगता है मानो हर आत्मा को झकझोर कर जवाब मांग रहे हों।
उन्होंने पूरे भारत के सामने असम को सुनाया, दिखाया, महसूस कराया। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि आधुनिक असम की सांस्कृतिक पहचान को गढ़ने में उनका बड़ा योगदान रहा। असम के भीतर और दुनिया भर के असमिया प्रवासियों, दोनों के लिए वो असम की आवाज बने।
भूपेन दा राजनीतिक व्यक्ति नहीं थे, फिर भी जनसेवा की दुनिया से जुड़े रहे। 1967 में वे असम के नौबोइचा से निर्दलीय विधायक चुने गए। यह दिखाता है कि लोगों को उन पर कितना गहरा विश्वास था। उन्होंने राजनीति को अपना करियर नहीं बनाया, लेकिन हमेशा लोगों की सेवा में जुटे रहे।
भारत की जनता और भारत सरकार ने उनके योगदान का सम्मान किया। उन्हें पद्मश्री, पद्मभूषण, पद्मविभूषण, दादासाहेब फाल्के अवार्ड समेत कई सम्मान मिले। 2019 में हमारे कार्यकाल के दौरान उन्हें भारत रत्न मिला। यह मेरे लिए और एनडीए सरकार के लिए भी सम्मान की बात थी। दुनिया भर में, खासकर असम और उत्तर-पूर्व के लोगों ने, इस अवसर पर खुशी जताई। यह उन सिद्धांतों का सम्मान था, जिन्हें भूपेन दा दिल से मानते थे। वो कहते थे कि सच्चाई से निकला संगीत किसी एक दायरे में सिमट कर नहीं रहता। एक गीत लोगों के सपनों को पंख लगा सकता है, और दुनिया भर के दिलों को छू सकता है।
मुझे 2011 का वह समय याद है जब भूपेन दा का निधन हुआ। मैंने टीवी पर देखा, उनके अंतिम संस्कार में लाखों लोग पहुंचे। हर आंख नम थी। जीवन की तरह, मृत्यु में भी उन्होंने लोगों को साथ ला दिया। इसलिए उन्हें जलुकबाड़ी की पहाड़ी पर ब्रह्मपुत्र की ओर देखते हुए अंतिम विदाई दी गई, वही नदी जो उनके संगीत, उनके प्रतीकों और उनकी स्मृतियों की जीवनरेखा रही है। अब ये देखना बहुत सुखद है कि असम सरकार भूपेन हजारिका कल्चरल ट्रस्ट के कार्यों को बढ़ावा दे रही है। यह ट्रस्ट युवा पीढ़ी को भूपेन दा की जीवन यात्रा से जोड़ने में जुटा है।
भूपेन दा की सांस्कृतिक विरासत को सम्मान देने के लिए देश के सबसे बड़े पुल को भूपेन हजारिका सेतु नाम दिया गया। 2017 में जब मुझे इस सेतु के उद्घाटन का अवसर मिला, तो मैंने महसूस किया कि असम और अरुणाचल…इन दो राज्यों को जोड़ने वाले, उनके बीच की दूरी कम करने वाले इस सेतु के लिए भूपेन दा का नाम सबसे उपयुक्त है।
भूपेन हजारिका का जीवन हमें करुणा की शक्ति का एहसास कराता है। लोगों को सुनने और अपनी मिट्टी से जुड़े रहने की सीख देता है। उनके गीत आज भी बच्चों और बुजुर्गों, दोनों की ज़ुबान पर हैं। उनका संगीत हमें माननीय और साहसी बनना सिखाता है। वह हमें अपनी नदियों, अपने मजदूरों, अपने चाय बागान के कामगारों, अपनी नारी शक्ति और अपनी युवा शक्ति को याद रखने को कहता है। वह हमें विविधता में एकता पर भरोसा करने के लिए प्रेरित करता है।
भारत भूपेन हजारिका जैसे रत्न से धन्य है। जब हम उनके शताब्दी वर्ष का आरंभ कर रहे हैं, तो आइए यह संकल्प लें कि उनके संदेश को दूर-दूर तक पहुंचाएंगे। यह संकल्प हमें संगीत, कला और संस्कृति के लिए और काम करने की प्रेरणा दे, नई प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करे, भारत में सृजनात्मकता और कलात्मक उत्कृष्टता को बढ़ावा दे। मेरी बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

jalbharav-samasya : बरसात में जलभराव से निजात के लिए स्थायी समाधान जरूरी : नेता प्रतिपक्ष भरत

Bilaspur Barish Jalbharav Samasya एक बार फिर सामने आई है। तेज बरसात से शहर के कई वार्डों में पानी भर गया, जिससे लोगों का जनजीवन प्रभावित हुआ। इसी पर नेता प्रतिपक्ष भरत कश्यप ने नगर निगम से स्थायी समाधान निकालने की मांग की है।

बिलासपुर। शहर में हुई लगातार बारिश के बाद कई वार्डों में जलभराव की स्थिति बनने पर नगर निगम के नेता प्रतिपक्ष भरत कश्यप ने निगम प्रशासन को गंभीर कदम उठाने की सलाह दी है। उन्होंने कहा कि दलगत राजनीति से ऊपर उठकर बाढ़ से बचाव और पानी निकासी की समस्या का स्थायी समाधान होना चाहिए।

भरत कश्यप ने सुझाव दिया कि जिन इलाकों में हर साल पानी भरता है, वहां तकनीकी टीम से सर्वे कराकर नालियों और नालों का निर्माण किया जाए। ताकि आने वाले वर्षों में बारिश के समय नागरिकों को बार-बार जलभराव का सामना न करना पड़े।

हर साल दोहराई जाती है समस्या

कश्यप ने कहा कि बारिश के बाद नगर निगम प्रशासन पानी निकासी पर कोई ठोस योजना नहीं बनाता। परिणामस्वरूप हर साल वही स्थिति दोहराई जाती है। हाल ही में हुई तेज बारिश में कई मोहल्लों में 2000 से अधिक घरों में पानी घुस गया, कच्चे मकान ढह गए और झुग्गी बस्तियों के लोग सड़क पर आ गए।

इन इलाकों में जलभराव की समस्या

नेता प्रतिपक्ष ने बताया कि पुराना बस स्टैंड, श्रीकांत वर्मा मार्ग, विनोबा नगर, लिंक रोड, तोरवा, देवरी खुर्द, अरविंद नगर, बंधवा पारा, जोरा पारा, नेहरू नगर, कस्तूरबा नगर और पत्रकार कॉलोनी सहित कई इलाके हर साल बाढ़ जैसी स्थिति झेलते हैं। इन क्षेत्रों में नालों और कलवर्ट का वैज्ञानिक ढंग से निर्माण जरूरी है।

सभी दलों को साथ आने का आग्रह

भरत कश्यप ने कहा कि भाजपा और कांग्रेस दोनों की सरकारों के दौरान नालों पर करोड़ों रुपये खर्च हुए, लेकिन स्थायी समाधान आज तक नहीं निकल सका। उन्होंने महापौर और निगम प्रशासन से अपील की कि सभी पार्षदों और इंजीनियरों की बैठक बुलाकर, सर्वे कराकर ठोस कार्ययोजना बनाई जाए।

उन्होंने कहा – “जब शहर में ट्रिपल इंजन की सरकार है तो उसका फायदा जनता को मिलना चाहिए। दलगत राजनीति छोड़कर ज्वाली नाला की तर्ज पर स्थायी व्यवस्था हो, तभी शहर स्वच्छ और सुंदर बन पाएगा।”

PM Viksit Bharat Rozgar प्रधानमंत्री विकसित भारत रोज़गार योजना देगी युवा शक्ति के सपनों को नई उड़ान

PM Viksit Bharat Rozgar : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर ‘प्रधानमंत्री विकसित भारत रोज़गार योजना’ की घोषणा की, जो देश के युवाओं को नई उड़ान देने वाली ऐतिहासिक पहल मानी जा रही है। 1 लाख करोड़ रुपये के परिव्यय वाली यह योजना 3.5 करोड़ से अधिक रोज़गार सृजित करने का लक्ष्य रखती है और इसमें पहली बार नौकरी करने वालों के साथ-साथ नियोक्ताओं को भी प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा। इसके जरिए न केवल औपचारिकीकरण और सामाजिक सुरक्षा को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि भारत के विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में एक मजबूत आधार भी तैयार होगा।

डॉ. मनसुख मांडविया केंद्रीय श्रम एवं रोजगार तथा युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्री, भारत सरकार

भारत की विकास गाथा हमेशा से उसकी श्रम शक्ति द्वारा लिखी गई है। देश की अर्थव्यवस्था को गति देने में करोड़ों श्रमिकों के समर्पण और क्षमता की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में, पिछले 11 वर्षों में भारत की आर्थिक प्रगति ने उल्लेखनीय प्रगति की है। वर्ष 2014 में, भारत विश्व की 10वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था से आगे बढ़ते हुए आज चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। भारत ने वैश्विक पटल पर अपने लिए एक उल्लेखनीय स्थान बनाया है और इसमें इसके मानव संसाधन की शक्ति की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
इस सफलता की कहानी को बल देने वाला तथ्य यह है कि भारत के आर्थिक विकास के साथ-साथ रोजगार का अभूतपूर्व विस्तार हुआ है। आरबीआई-केएलईएमएस के अनुसार, जहां 2004-2014 के बीच केवल 2.9 करोड़ रोजगार सृजित हुए थे, उसके बाद के दशक में 17 करोड़ से अधिक रोजगार सृजित हुए। औपचारिकीकरण में भी तेजी आई है, ईपीएफओ के आंकड़ों के अनुसार पिछले सात वर्षों में लगभग आठ करोड़ नौकरियां सृजित हुई हैं।
भारत में सामाजिक सुरक्षा कवरेज में बढ़तोरी होना भी हमारी एक बड़ी उपलब्धि है। 2015 में, केवल 19 प्रतिशत भारतीय कम से कम एक सामाजिक सुरक्षा योजना के अंतर्गत आते थे। 2025 तक, यह संख्या बढ़कर 64.3 प्रतिशत हो चुकी है और 94 करोड़ लाभार्थी इसके दायरे में आए हैं, जिससे भारत दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा सामाजिक सुरक्षा कवरेज देने वाला देश बन गया है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन ने इस उपलब्धि को वैश्विक स्तर पर कवरेज के सबसे तेज विस्तार में से एक माना है।
यह स्पष्ट है कि राष्ट्र का भविष्य न केवल जीडीपी वृद्धि की गति से, बल्कि हमारे द्वारा सृजित नौकरियों की गुणवत्ता, श्रमिकों को दी जाने वाली सुरक्षा और अपने युवाओं को प्रदान किए जाने वाले अवसरों से भी तय होगा। बढ़ते स्वचालन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से कारण बनी अनिश्चितता की स्थिति, आपूर्ति-श्रृंखला में बदलाव और दुनिया भर में नौकरियों को आकार देने वाली कई अन्य कमजोरियों की वैश्विक पृष्ठभूमि में, भारत एक जनसांख्यिकीय परिवर्तन के बिंदु पर खड़ा है।
हमारी 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है, जो एक महत्वपूर्ण जनसांख्यिकीय लाभांश है जो हमारी अर्थव्यवस्था को गति दे देता है, जबकि पश्चिमी देशों में आबादी वृद्ध होती हो रही है। वर्षों से, भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश यानी इसकी युवा शक्ति को इसकी सबसे बड़ी ताकत माना जाता रहा है। फिर भी, पिछली सरकारों के अधीन, इस क्षमता का पूरा उपयोग नहीं किया गया। अमृत काल में, जब हम 2047 तक एक विकसित भारत के विजन की दिशा में प्रयास कर रहे हैं, हमारे सामने कार्य स्पष्ट है: हमें “संभावना” से “समृद्धि” की ओर बढ़ना होगा।
इस पृष्ठभूमि में, रोजगार अब केवल एक आर्थिक संकेतक नहीं रह गया है; यह सम्मान, समानता और राष्ट्रीय शक्ति का आधार है। इसके लिए आवश्यक है कि हम अपने युवाओं को रोजगार योग्य बनाएं, उन्हें औपचारिक अर्थव्यवस्था में एकीकृत करें, उन्हें वित्तीय साक्षरता से लैस करें और यह सुनिश्चित करें कि वे एक मजबूत सामाजिक सुरक्षा प्रणाली द्वारा सुरक्षित हों। तभी हमारा जनसांख्यिकीय लाभ वास्तव में एक स्थायी राष्ट्रीय लाभांश में परिवर्तित हो सकता है।
इसी चुनौती का समाधान करने और आकांक्षा व अवसर के बीच के अंतर को पाटने के लिए, 15 अगस्त को लाल क़िले की प्राचीर से प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने प्रधानमंत्री विकसित भारत रोजगार योजना शुरू करने की घोषणा की है। शुरुआत में केंद्रीय बजट 2024-25 में प्रस्तुत और प्रधानमंत्री जी के अपने 12वें स्वतंत्रता दिवस संबोधन में घोषित यह योजना पैमाने और डिजाइन, दोनों ही दृष्टि से एक महत्वपूर्ण बदलाव का प्रतिनिधित्व करती है। 1 लाख करोड़ रुपए के परिव्यय के साथ, यह भारत के इतिहास का सबसे महत्वाकांक्षी कार्यक्रम है, जिससे 3.5 करोड़ से ज़्यादा रोजगार सृजित होने की उम्मीद है। इनमें से दो करोड़ लाभार्थी पहली बार नौकरी पाने वाले होंगे।
योजना के दो स्तंभ: पहली बार नौकरी करने वाले कर्मचारियों को प्रोत्साहन और नियोक्ताओं को सहायता
प्रधानमंत्री विकसित भारत रोजगार योजना को इसकी संरचना ही अलग बनाती है। रोजगार सृजन को बढ़ावा देने वाले पहले के कार्यक्रमों के विपरीत, यह योजना युवाओं की रोजगार क्षमता और उद्यम प्रतिस्पर्धात्मकता की दोहरी चुनौती का एक साथ समाधान करती है। भाग ‘ए’ के तहत पहली बार नौकरी करने वाले कर्मचारियों (दो किश्तों में 15,000 रुपए तक) और भाग ‘बी’ के तहत नियोक्ताओं (प्रत्येक नए कर्मचारी के लिए प्रति माह 3,000 रुपए तक) को प्रत्यक्ष वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान करके, यह श्रमिकों के लिए प्रवेश बाधाओं को कम करता है और साथ ही व्यवसायों के लिए नियुक्ति जोखिम को भी कम करता है।
इस योजना का औपचारिकीकरण और सामाजिक सुरक्षा एकीकरण की दिशा में प्रोत्साहन भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इसके लाभ प्रत्यक्ष लाभ अंतरण के माध्यम से प्रदान किए जाएंगे, जिससे पारदर्शिता सुनिश्चित होगी और नए कर्मचारियों को पहले दिन से ही सामाजिक सुरक्षा प्रणालियों से जोड़ा जा सकेगा। इस प्रकार, प्रधानमंत्री विकसित भारत रोजगार योजना, एक औपचारिक, सुरक्षित और उत्पादक श्रम बाजार की ओर एक संरचनात्मक कदम है। इसके अलावा, विनिर्माण क्षेत्र में नियोक्ताओं को प्रोत्साहन पर अतिरिक्त ध्यान, भारत को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक और प्रयास है।
समावेशी और सतत विकास को गति देना
प्रधानमंत्री विकसित भारत रोजगार योजना, योजना-आधारित पहलों से हटकर एक व्यापक रोजगार प्रणाली की ओर बदलाव का संकेत देती है। यह पूर्व की पहलों से मिली सीख पर आधारित है, उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई), राष्ट्रीय विनिर्माण मिशन और मेक इन इंडिया जैसी वर्तमान योजनाओं का पूरक है और प्रतिस्पर्धी वैश्विक व्यवस्था में काम की बदलती प्रकृति को पहचानती है।
श्रमिकों और नियोक्ताओं, दोनों को प्रोत्साहन देकर, प्रधानमंत्री विकसित भारत रोजगार योजना यह मान्यता देती है कि रोजगार सृजन एक साझा जिम्मेदारी है। भारत डिजिटल नवाचार को अपनाते हुए एक वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनने का प्रयास कर रहा है, इसलिए यह योजना सुनिश्चित करती है कि कोई भी पीछे न छूटे – यहां तक कि सबसे छोटा उद्यम और कार्यबल में शामिल होने वाला सबसे नया व्यक्ति भी राष्ट्रीय विकास की यात्रा में भागीदार बने।
प्रधानमंत्री विकसित भारत रोजगार योजना: नए भारत की नींव
प्रधानमंत्री विकसित भारत रोजगार योजना एक नीतिगत घोषणा से कहीं अधिक बढ़कर है। यह जनसांख्यिकीय लाभांश को सार्वजनिक समृद्धि में बदलने की दिशा में एक ठोस कदम है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में, यह पहल विकसित भारत के विजन को साकार करने की नींव का हिस्सा है, जहां हर युवा को सार्थक रोजगार मिले, हर काम में सम्मान हो और हर युवा को अपने सपनों को साकार करने का अवसर मिले।
रोजगार निर्माण सही मायने में राष्ट्र निर्माण है। इस पहल के साथ, मोदी सरकार अपनी इस प्रतिबद्धता के साथ आगे बढ़ रही है कि कोई भी आकांक्षा अधूरी नहीं रहेगी और कोई भी युवा अवसर से वंचित नहीं रहेगा। हम सब मिलकर भारत की युवा शक्ति को नई उड़ान दे रहे हैं और उनके माध्यम से, विकसित भारत के सपने को भी नई गति प्रदान कर रहे हैं।

Gaganyaan : ‘2035 तक भारत का अपना अंतरिक्ष स्टेशन होगा’

Gaganyaan   : भारत अंतरिक्ष अन्वेषण के नए युग की ओर बढ़ रहा है। केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि गगनयान मिशन न सिर्फ मानव अंतरिक्ष उड़ान क्षमताओं की पुनः पुष्टि करेगा, बल्कि 2035 तक भारत के अपने अंतरिक्ष स्टेशन की नींव भी रखेगा। इससे भारत वैश्विक अंतरिक्ष समुदाय में अग्रणी भूमिका निभाएगा और वैज्ञानिक अनुसंधान से लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा तक नई संभावनाएँ खुलेंगी।

डॉ. जितेंद्र सिंह द्वारा केंद्रीय मंत्री : केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह का कहना है भारत की अंतरिक्ष आकांक्षाओं को पूरा करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित होगा, जो उसकी मानव अंतरिक्ष उड़ान क्षमताओं की पुनः पुष्टि करेगा और पृथ्वी के लिए लाभकारी अनुप्रयोगों सहित वैज्ञानिक ज्ञान में वृद्धि करेगा।
प्रश्न: भारत के अंतरिक्ष भविष्य के लिए गगनयान का सबसे बड़ा परिणाम क्या होगा?
उत्तर:अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत का उदय पहले ही हो चुका है और इसे वैश्विक स्त्र पर स्वीककार किया गया है। अब हम अनुयायी मात्र नहीं हैं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय सहयोग में समान भागीदार हैं। गगनयान मिशन एक और निर्णायक मोड़ का प्रतीक होगा। यह न केवल मानव अंतरिक्ष उड़ान में भारत की क्षमताओं की पुन:पुष्टि करेगा, बल्कि हमारे वैज्ञानिक ज्ञान में भी वृद्धि करेगा। अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन में अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला द्वारा सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण या माइक्रोग्रेविटी, कृषि और जीवन विज्ञान पर किए गए प्रयोगों के साथ-साथ, यह मिशन पृथ्वी पर अनुप्रयोगों के बारे में जानकारी प्रदान करेगा। यह भारत को अंतरिक्ष अन्वेषण में अग्रणी देश के रूप में स्थापित करेगा, जबकि हम बुनियादी ढाँचे, विकास और जीवन को सुगम बनाने के लिए अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी का उपयोग जारी रखेंगे।
प्रश्न: शुक्ला जैसे युवा अंतरिक्ष यात्रियों के आने से, हमारी मानव अंतरिक्ष यात्रा को आकार देने में युवाओं की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है?
उत्तर:अंतरिक्ष सहित हर क्षेत्र में भारत के भविष्य के लिए युवा अपरिहार्य हैं। हमारी 70 प्रतिशत से अधिक आबादी 40 वर्ष से कम आयु की है, इसलिए स्वाभाविक रूप से, वे विकसित भारत के पथप्रदर्शक हैं। अंतरिक्ष में, शारीरिक और मानसिक अनुकूलनशीलता की आवश्यकता के कारण युवाओं को बढ़त हासिल है। उदाहरण के लिए, गगनयान के लिए प्रशिक्षित चार अंतरिक्ष यात्रियों में, शुभांशु सबसे कम उम्र के थे और यह बात लाभदायकरही। अंतरिक्ष मिशनों के लिए त्वरित अनुकूलन की आवश्यकता होती है, जिसे युवा अधिक कुशलता से संभाल सकते हैं।
प्रश्न:क्या आपको लगता है कि गगनयान वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और महिला अंतरिक्ष यात्रियों के लिए संभावनाओं के द्वार खोलेगा?
उत्तर:जी बिल्कुल। अंतरिक्ष विज्ञान में पुरुषों और महिलाओं के बीच कोई भेद नहीं है। 15 अगस्त, 2018 कोजब प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने पहली बार गगनयान की घोषणा की थी, तो उन्होंने कहा था कि भारत का एक बेटा या बेटी अंतरिक्ष में जाएंगे । वर्तमान में, चयनित चार अंतरिक्ष यात्री पुरुष हैं,वे वायु सेना से हैंऔरइसका कारण मुख्यतः उनका उन्नत प्रशिक्षण प्राप्तन होना है। लेकिन आगे चलकर, वायु सेना से बाहर के अंतरिक्ष यात्रियों को भी शामिल किया जाएगा, जिनमें महिलाएँ भी होंगी। वैश्विक स्तर पर, महिलाएँ अंतरिक्ष अन्वेषण में अग्रणी रही हैं। भारत में भी, इसरो की कई परियोजनाओं का नेतृत्व महिला वैज्ञानिकों ने किया है, चाहे वह चंद्रयान हो, आदित्य हो या अन्य।
प्रश्न: क्या गगनयान भारत के लिए अंतर्राष्ट्रीय मानवयुक्त अंतरिक्ष यान मिशनों में शामिल होने या अपना स्वयं का अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त करेगा?
उत्तर:भारत 2035 तक भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन नामक स्वयं का अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करने वाला है। प्रधानमंत्री ने “सुदर्शन सुरक्षा चक्र” का भी उल्लेख किया है, जहाँ अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी राष्ट्रीय सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। इसलिए, 2035 एक युगांतकारी वर्ष होगा… उसके पाँच साल बाद, भारत का लक्ष्य चंद्रमा की सतह पर मानव सहित मिशन भेजना है।
प्रश्न: भारत सेमीकंडक्टर और एआई तकनीकों में प्रगति कर रहा है, ऐसे में सरकार भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन जैसी परियोजनाओं के लिए सेमीकंडक्टर मिशन को अंतरिक्ष-स्तरीय आवश्यकताओं के साथ कैसे जोड़ रही है?
उत्तर:सेमीकंडक्टरों के व्यापक अनुप्रयोग होंगे, जिनमें अंतरिक्ष मिशन भी शामिल हैं। इसी प्रकार, छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर न केवल पृथ्वी के घने या दुर्गम क्षेत्रों में, बल्कि लंबी अवधि के अंतरिक्ष अभियानों के लिए भी महत्वपूर्ण होंगे। ये तकनीकें अंतरिक्ष स्टेशन जैसी भविष्य की परियोजनाओं को बनाए रखने में महत्वपूर्ण होंगी।
प्रश्न:चंद्रमा या मंगल मिशन के दौरान आप भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को किस प्रकार के प्रयोग करते देखना चाहेंगे?
उत्तर:हाल के मिशन में, प्रयोगों को सात श्रेणियों में बांटा गया था। जीवन विज्ञान विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहा। उदाहरण के लिए, मायोजेनेसिस—सूक्ष्मगुरुत्व या माइक्रोग्रेविटी में मांसपेशियों के क्षय और पुनर्जनन—का अध्ययन कैंसर, मधुमेह या यहाँ तक कि पृथ्वी पर फ्रैक्चर से उबरने जैसी स्थितियों के लिए सीधे तौर पर प्रासंगिक है। एक अन्य समूह ने लंबे समय तक स्क्रीन के संपर्क में रहने के संज्ञानात्मक प्रभावों का अध्ययन किया, जो आज के डिजिटल युग में अत्यधिक प्रासंगिक है। हमने सूक्ष्मगुरुत्व या माइक्रोग्रेविटीमें मेथी जैसे पौधे उगाने का भी प्रयोग किया, जो पुनर्योजी जीव विज्ञान और आनुवंशिक अनुप्रयोगों से संबंधित अनुसंधान में सहायक हो सकता है।
मुख्य बात यह है कि अंतरिक्ष प्रयोग केवल कक्षा में मौजूद अंतरिक्ष यात्रियों तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि वे पृथ्वी पर लोगों के लिए भी लाभकारी हैं और ‘विश्वगुरु भारत’ के विचार को आगे बढ़ाते हैं।
प्रश्न: स्पैडेक्स के बाद, भारत वैश्विक ग्राहकों के लिए अंतरिक्ष डॉकिंग और उपग्रह सेवा का मुद्रीकरण कब शुरू करेगा?
उत्तर:हमने स्पैडेक्स के माध्यम से डॉकिंग और अनडॉकिंग का अनुभव प्राप्त करना शुरू कर दिया है। आगामी चंद्रयान-4 मिशन, जो 2028 के आसपास अपेक्षित है, में जटिल डॉकिंग और अनडॉकिंग प्रक्रियाएँ करने वाले कई मॉड्यूल शामिल होंगे। इससे हमें अंतरिक्ष स्टेशन जैसी बड़ी परियोजनाओं के लिए आवश्यक विशेषज्ञता प्राप्त होगी। अंतरिक्ष पर्यटन व्यवहार्य होते ही, डॉकिंग तकनीक यात्री सुरक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण होगी। समय के साथ, भारत द्वारा वैश्विक ग्राहकों के लिए डॉकिंग, सर्विसिंग और पर्यटन संबंधी बुनियादी ढाँचा प्रदान करने के साथ ही मुद्रीकरण भी होगा।
प्रश्न: भारत सार्वजनिक-निजी भागीदारी के माध्यम से पाँच वर्षों में 52 जासूसी उपग्रह प्रक्षेपित करने की योजना बना रहा है। ऐसे सहयोगों से राष्ट्रीय सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी?
उत्तर:सुरक्षा उपाय पहले से ही मौजूद हैं। हमने इन-स्पेतस (भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन एवं प्राधिकरण केंद्र) बनाया है, जो अंतरिक्ष में सार्वजनिक-निजी भागीदारी को नियंत्रित करता है। यह सुरक्षा संबंधी सरोकारों का पूरी तरह ध्यान में रखना सुनिश्चित करते हुए सहयोग के पैमाने और प्रकृति का निर्धारण करता है। साथ ही, हमने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति देकर इस क्षेत्र को उदार बनाया है। विनियमन और खुलेपन का यह संतुलन राष्ट्रीय हितों से समझौता किए बिना नवाचार को संभव बनाता है।
प्रश्न:1,000 करोड़ रुपये के उद्यम पूंजी कोष को मंज़ूरी मिल गई है, लेकिन पिछले साल अंतरिक्ष-तकनीक फंडिंग में कमी आई। यह कोष स्टार्टअप्स को कैसे सहायता देगा?
उत्तर:कुछ साल पहले तक, अंतरिक्ष क्षेत्र में स्टार्टअप्स का होना लगभग असामान्ये था। आज, हमारे पास लगभग 400 स्टार्टअप हैं, जिनमें से कुछ पहले ही सफल उद्यमी बन चुके हैं। स्टार्टअप केवल रॉकेट लॉन्च करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ये मैपिंग, स्मार्ट सिटी, कृषि, टेलीमेडिसिन और दूरसंचार जैसे क्षेत्रों में भी फैले हुए हैं।
इस कोष का उद्देश्य उन्हें आगे बढ़ने के लिए आवश्यक वित्तीय सहायता प्रदान करना है। अंतरिक्ष अचानक करियर का एक आकर्षक विकल्प बन गया है। एयरोस्पेस इंजीनियरिंग, जो कभी एक विशिष्ट क्षेत्र हुआ करता था, अब आईआईटी में सबसे अधिक मांग वाली शाखाओं में से एक है। यह बदलाव अपने आप में इस क्षेत्र में बढ़ते अवसरों को दर्शाता है।
प्रश्न: भारत ने 2033 तक वैश्विक अंतरिक्ष बाजार का8 प्रतिशत हिस्सा प्राप्तत करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। उपग्रह प्रक्षेपणों के अलावा, कौन सी तकनीकें भारत को स्पेसएक्स और चीन से मुकाबला करने में मदद करेंगी?
उत्तर:ज़्यादा ध्यान रॉकेट और प्रक्षेपणों पर है, लेकिन लगभग आधे अंतरिक्ष अनुप्रयोग पृथ्वी पर ही हैं। अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी कृषि, बुनियादी ढाँचे और यहाँ तक कि युद्ध में भी एकीकृत है। प्रधानमंत्री गति शक्ति योजना का ही उदाहरण लें; यह समय, धन और कागजी कार्रवाई बचाने के लिए उपग्रह चित्रों का उपयोग करती है, जिससे आर्थिक विकास में सीधा योगदान मिलता है। इसी तरह, अंतरिक्ष इनपुट किसानों को बुवाई और फसल उगाने का समय तय करने में मदद करते हैं। ये बचत धन सृजन जितनी ही मूल्यवान है। इसलिए हमें उम्मीद हैं कि भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था, जो वर्तमान में लगभग 8 बिलियन डॉलर है, अगले दशक में पाँच गुना बढ़कर 40-45 बिलियन डॉलर हो जाएगी, जिससे भारत को वैश्विक रैंकिंग में ऊपर उठने में मदद मिलेगी।
प्रश्न/ क्या आप केवल वायु सेना के पायलटों को ही नहीं, बल्कि आम नागरिकों को भी भारत के अंतरिक्ष यात्री समूह में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करेंगे?
उत्तर:बिल्कुल। फ़िलहाल, वायु सेना के पायलट हाई एल्टीट्यूड जेट विमानों में प्रशिक्षण के कारण बेहतर रूप से तैयार हैं, लेकिन यह तो बस शुरुआत है। भविष्य में, हमारे अंतरिक्ष यात्री समूह का विस्तार होगा और इसमें आम नागरिक, महिलाएँ, जैव-प्रौद्योगिकीविद, अंतरिक्ष चिकित्सक और यहाँ तक कि मीडिया पेशेवर भी शामिल होंगे ताकि मिशनों को वास्तविक समय में रिकॉर्ड किया जा सके। जैसे-जैसे यह प्रणाली विकसित होगी, भारत को अपनी महत्वाकांक्षी योजनाओं को पूरा करने के लिए अंतरिक्ष यात्रियों के एक बड़े और अधिक वैविध्यकपूर्ण समूह की आवश्यकता होगी।