Bharat GDP Growth : भारत का आर्थिक मंथन और विकास का अमृत

Bharat GDP Growth: हरदीप एस. पुरी लेखक केन्द्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हैं

Bharat GDP Growth: भारतीय सभ्यतामें अरसे से यह मान्यता रही है कि कामयाबीसे पहलेपरीक्षाहोती है। समुद्र मंथन, जहांमथने की प्रकिया से अमृत निकला था,इसी तरहहमारे आर्थिक मंथन ने भी हमेशा ही नवीनता का मार्ग प्रशस्त किया है। वर्ष1991के संकट से जहां उदारीकरण का जन्म हुआ; वहीं महामारी से डिजिटल उपयोग तेज हुआ।और आज, भारत को एक “मृत अर्थव्यवस्था” कहने वाले संशयवादियों के शोर-शराबे के बीच-तीव्र विकास, मजबूत बफर, और व्यापक अवसर – की एक तथ्यपरक कहानी उभर कर सामने आई है।
जीडीपी के ताजा आंकड़ों पर जरागौर करें। वित्तीय वर्ष 2025-26 की पहली तिमाही में वास्तविक जीडीपी 7.8 प्रतिशत की दर से बढ़ी। यह वृद्धि दरपिछली पांच तिमाहियों में सबसे अधिक है। महत्वपूर्ण बात यह है कि यह वृद्धि व्यापक है: सकल मूल्य वर्धन (जीवीए) 7.6 प्रतिशत बढ़ा है, जिसमें मैन्यूफैक्चरिंग 7.7 प्रतिशत, निर्माण 7.6 प्रतिशत और सेवा क्षेत्र लगभग 9.3 प्रतिशतबढ़ा है। नॉमिनल जीडीपी में 8.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। यह कोईमनमाने तरीके से बताई गई तेजी नहीं है।यह बढ़ते उपभोग, मजबूत निवेश और निरंतरसार्वजनिक पूंजीगत व्यय वपूरी अर्थव्यवस्था में लागत कम करने वाले लॉजिस्टिक्स संबंधी सुधारों से हासिल नतीजोंका सबूत है।
भारत अब दुनिया की चौथी सबसे बड़ी और सबसे तेज गति से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था है। यह तेजी के मामले में दुनिया की पहली और दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं क्रमशःअमेरिका और चीनसे भी आगे निकल गई है। वर्तमान गति से, हम इस दशक के अंत तक जर्मनी को पीछे छोड़कर बाजार-विनिमय के संदर्भ में तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर हैं। हमारी गति वैश्विक स्तर पर मायने रखती है।स्वतंत्र अनुमान बताते हैं कि भारत पहले से ही वैश्विक वृद्धि में 15 प्रतिशत से अधिक का योगदान दे रहा है। प्रधानमंत्री ने एक स्पष्ट लक्ष्यरखा है —सुधारों के मजबूत होने और नई क्षमताओं के सामने आने के साथ-साथ वैश्विक वृद्धि में हमारी हिस्सेदारी बढ़कर 20 प्रतिशत तक पहुंचे।
विभिन्न बाजारों और रेटिंग एजेंसियों ने हमारे इस अनुशासन को मान्यता दी है। एसएंडपी ग्लोबल ने मजबूत विकास, मौद्रिक विश्वसनीयता और राजकोषीय सुदृढ़ीकरण का हवाला देते हुए, 18 वर्षों में पहली बार भारत की ‘सॉवरेन रेटिंग’ को उन्नत किया है। इस अपग्रेड से उधार लेने की लागत कम होती है और निवेशक आधार का विस्तार होता है। यह “मृत अर्थव्यवस्था” की धारणा को भी झुठलाता है। जोखिम के स्वतंत्र मूल्यांकनकर्ताओं ने अपनी रेटिंग के साथ अपना मत दिया है।
उतना ही महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि आखिर इस सबका लाभ किसे मिला है। वर्ष 2013-14 और 2022-23 के बीच, 24.82 करोड़ भारतीय बहुआयामी गरीबीसे बाहर निकल आए हैं। यह बदलाव उन बुनियादी सेवाओं – बैंक खाते, रसोई के लिए स्वच्छ ईंधन, स्वास्थ्य बीमा, नल का जलऔर प्रत्यक्ष हस्तांतरण – की बड़े पैमाने पर आपूर्ति पर निर्भर है जो गरीबों को विकल्प चुनने का अधिकार देता है। दुनिया के सबसे जीवंत लोकतंत्र और उल्लेखनीय जनसांख्यिकीय चुनौतियों के बीच विकास का यह पैमाना बेहद खास है। विकास का भारत का यह मॉडल आम सहमति के निर्माण, प्रतिस्पर्धी संघवाद और डिजिटल माध्यमों के उपयोग से अंतिम छोर तक सेवा प्रदान करने को महत्व देता है। यह घोषणा के मामले में धीमा,क्रियान्वयन के मामले में तेज और निर्माण की दृष्टि से टिकाऊ है। जब आलोचक हमारी तुलना तेज भागने वाले सत्तावादियों से करते हैं, तो वे इस तथ्य को नजरअंदाज कर देते हैं किहम मैराथन धावक की तर्ज पर लंबी दूरी तय करने वाली एक अर्थव्यवस्था का निर्माण कर रहे हैं।
भारत के पेट्रोलियम मंत्री के रूप में, मैं इस बात की पुष्टि कर सकता हूं कि हमारी ऊर्जा सुरक्षा इस तीव्र विकास में किस प्रकार सहायक की भूमिका निभा रहीहै। आज, भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता, चौथा सबसे बड़ा तेलशोधक (रिफाइनर) और एलएनजी का चौथा सबसे बड़ा आयातक है। हमारी तेलशोधन (रिफाइनिंग) क्षमता 5.2 मिलियन बैरल प्रतिदिन से अधिक हैऔर इस दशक के अंत तक इसे 400 मिलियनटन प्रति वर्ष (एमटीपीए) से आगे बढ़ाने का एक स्पष्ट रोडमैप हमारे पास उपलब्ध है।
भारत की ऊर्जा संबंधी मांग – जो 2047 तक दोगुनी होने का अनुमान है – बढ़ती वैश्विक मांग का लगभग एक-चौथाई हिस्सा होगी, जिससे हमारी सफलता वैश्विक ऊर्जा स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण बन जाएगी। सरकार का दृष्टिकोण सुरक्षा को सुधार के साथ जोड़ने का रहा है। तेल की खोज का क्षेत्र 2021 में तलछटी घाटियों के 8 प्रतिशत से बढ़कर 2025 में 16 प्रतिशत से अधिक हो गया है। हमारालक्ष्य2030 तक इसे बढ़ाकर 10 लाख वर्ग किलोमीटर करना है। तथाकथित ‘निषिद्ध’ (नो-गो)क्षेत्रों में 99 प्रतिशत की भारी कमी ने अपार संभावनाओं को जन्म दिया है, जबकि ओपन एकरेज लाइसेंसिंग पॉलिसी (ओएएलपी)पारदर्शी वप्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया सुनिश्चित करती है। गैस मूल्य निर्धारण से संबंधी नए सुधारों – जिनमें कीमतों को भारतीय कच्चे तेल की टोकरी से जोड़ा गया है और गहरे पानी एवं नए कुओं के लिए 20 प्रतिशत प्रीमियम की पेशकश की गई है – ने निवेश को बढ़ावा दिया है।
हमारी ऊर्जा की कहानी सिर्फ हाइड्रोकार्बन की ही नहीं,बल्कि बदलाव की भी कहानी है। वर्ष 2014 में इथेनॉल मिश्रण 1.5 प्रतिशत से बढ़कर आज 1.25 लाख करोड़ रुपये से अधिक की विदेशी मुद्रा की बचत के बराबर हो गईहै और किसानों को सीधे एक लाख करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान हुआ है। सतत के तहत 300 से ज़्यादा संपीड़ित बायोगैस संयंत्र स्थापित किए जा रहे हैं, जिनका लक्ष्य 2028 तक 5 प्रतिशत मिश्रण का है और तेल से जुड़ी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां हरित हाइड्रोजन के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभा रही हैं।
भारत द्वारा रूस से कच्चे तेल की खरीद को लेकर कुछ जगहों में काफी शोरगुलहुआ है। आइए तथ्यों को इस शोरशराबे से अलग करके देखें। रूस की तेल पर ईरान या वेनेज़ुएला के कच्चे तेल की तरह कभी प्रतिबंध नहीं लगाया गया।यह जी7/ईयूमूल्य-सीमा प्रणाली के अंतर्गत है जिसे जानबूझकर राजस्व को सीमित रखते हुए तेल प्रवाह को बनाए रखने के लिए डिजाइन किया गया है। ऐसे पैकेजों के 18 दौर हो चुके हैंऔर भारत ने हरेक दौर का पालन किया है। प्रत्येक लेनदेन में कानूनी लदान(शिपिंग)एवं बीमा, अनुपालन करने वाले व्यापारियों और लेखा-परीक्षण (ऑडिट) किए गए चैनलों का उपयोग किया गया है। हमने कोई नियम नहीं तोड़े हैं।हमने बाजारों को स्थिर किया है और वैश्विक कीमतों को बढ़ने से रोका है।
कुछ आलोचकों का आरोप है कि भारत रूस के तेल के लिए एक “लौंड्रोमैट” बन गया है। इससे अधिक निराधार बात और कुछ नहीं हो सकती। भारत इस संघर्ष से काफी पहले दशकों से पेट्रोलियम उत्पादों का चौथा सबसे बड़ा निर्यातक रहा है और हमारे रिफाइनर विश्व भर से इस प्रकार के क्रूड का एक समूह बनाते हैं।निर्यात आपूर्ति श्रृंखलाओं को सक्रिय रखता है। वास्तव में, रूस के कच्चे तेल पर प्रतिबंध लगाने के बाद यूरोप ने भी भारतीय ईंधनों की ओर रुख किया। निर्यात की मात्रा और रिफाइनिंग मार्जिन (जीआरएम) मोटे तौर पर समान ही हैं।मुनाफे लेने का इसमें का कोई सवाल ही नहीं है।
यह तथ्य भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि भारत ने यूक्रेन संघर्ष के बाद वैश्विक कीमतों में उछाल आने पर अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए निर्णायक रूप से कदम उठाए। तेल से जुड़े सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) ने डीजल पर 10 रुपये प्रति लीटर तक के नुकसान को सहन किया।सरकार ने केन्द्रीय और राज्य के करों में कटौती कीऔर निर्यात से जुड़े नियमों ने यह अनिवार्य किया कि विदेशों में पेट्रोल और डीजल बेचने वाले रिफाइनर को घरेलू बाजार में कम से कम 50 प्रतिशत पेट्रोल और 30 प्रतिशतडीजल बेचना होगा।
इन उपायों ने, काफी राजकोषीय लागत पर, यह सुनिश्चित किया कि एक भी खुदरा दुकान खाली न रहे और परिणामस्वरूप भारतीय घरों के लिए कीमतेंस्थिररहीं। बड़ा सच यह है किवैश्विक तेल का लगभग 10 प्रातशत आपूर्ति करने वाले दुनिया के इस दूसरे सबसे बड़े उत्पादक का कोई विकल्प ही नहीं है। जो लोग उंगली उठा रहे हैं, वे इस तथ्य की अनदेखी करते हैं।वसुधैव कुटुम्बकम के अपने सभ्यतागत मूल्यों के अनुरूपभारत द्वारा सभी अंतरराष्ट्रीय मानदंडों का पालन करने से 200 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल के विनाशकारी झटके को रोका गया।
यह वही ‘मेड इन इंडिया’ है जो विश्व दृष्टिकोण के लिए भारत में आकार ले रही नई औद्योगिक क्रांति को आकार देता है। इस औद्योगिक क्रांति में सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, नवीकरणीय ऊर्जा, रक्षा और विशेष रसायन शामिल हैं – जो उत्पादन से जुड़े प्रोत्साहनों (पीएलआई)और पीएम गतिशक्ति लॉजिस्टिक्स के सहारे संचालित हैं। सेमीकंडक्टर के उत्पादन में तेजी अब एक नए स्तर पर पहुंच रही है – जो नीतिगत गंभीरता और क्रियान्वयन का प्रमाण है। मंत्रिमंडल ने हाल ही में भारत सेमीकंडक्टर मिशन के तहत चार अतिरिक्त सेमीकंडक्टर मैन्यूफैक्चरिंग परियोजनाओं को मंजूरी दी हैऔर प्रधानमंत्री का जापान में एक सेमीकंडक्टर उत्पादन केन्द्र का हालिया दौराऔर जापान की निवेश संबंधी नवीनीकृत प्रतिबद्धताएं एक सुदृढ़ एवं विश्वसनीय तकनीकी आपूर्ति श्रृंखलाओं से संबंधित एक साझा रोडमैप को रेखांकित करती हैं।
डिजिटल अर्थव्यवस्था इन लाभों को कई गुना बढ़ा देती है। भारत वास्तविक समय में भुगतान के मामले में दुनिया भर में अग्रणी है। यूपीआई की सर्वव्यापकता छोटे व्यवसायों की उत्पादकता बढ़ाती हैऔर हमारा स्टार्टअप इकोसिस्टम नवाचार को सेवाओं एवं समाधानों के निर्यात में बदल रहा है। जब डिजिटल तेजीवास्तविक बुनियादी ढांचे के साथ मिलती है, तो प्रभाव बढ़ता है और परिणाम स्वरूप कम टकराव, सुव्यवस्थितऔर निवेश एवं उपभोग का एक बेहतर चक्र सुनिश्चित होता है।
आगे का रास्ता आशाजनक है। स्वतंत्र अनुमानों (ईवाई) के अनुसार, 2038 तक भारत पीपीपी के आधार पर दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है, जिसका सकल घरेलू उत्पाद 34 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक होगा। यह प्रगति सतत सुधारों, मानव पूंजी और प्रत्येक उद्यम व परिवार के लिए प्रचुर, स्वच्छ एवं विश्वसनीय ऊर्जा पर निर्भर है।
एक महान सभ्यता की परीक्षा उसके कठिन क्षणों में होती है। अतीत में जब भी भारत की क्षमता पर संदेह किया गया, इस देश ने हरित क्रांतियों, आईटी क्रांतियों और शिक्षा व उद्यम के जरिए लाखों लोगों के गौरवपूर्ण उत्थान के साथ उसका जवाब दिया। आज का समय भी इससे कुछ अलग नहीं है। हम अपने दृष्टिकोण पर टिके रहेंगे, अपने सुधारों को निरंतर जारी रखेंगेऔर अपने विकास को तीव्र, लोकतांत्रिक एवं समावेशी बनाए रखेंगेताकि लाभ सबसे वंचित लोगों तक पहुंच सके। आलोचकों के लिए, हमारी उपलब्धियां ही हमाराजवाबहोंगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में, विकसित भारत महज एक आकांक्षा ही नहीं, बल्कि उपलब्धि का एक सार हैऔर विकास के ये आंकड़े उस व्यापक कहानी का ताजा अध्याय मात्र हैं।

Jan Dhan Yojana: भारत में वित्तीय समावेशन का अतीत,वर्तमान और भविष्य

Jan Dhan Yojana: अनिल गुप्ता माइक्रोसेव कंसल्टिंग में पार्टनर हैं और अभिषेक कटारिया माइक्रोसेव कंसल्टिंग में प्रबंधक

बहुत अधिक समय नहीं बीता जब केवल 35% भारतीयों के पास औपचारिक रूप से बैंक खाता हुआ करता था और उनमें से भी महज 8% औपचारिक ऋण की सुविधा लेते थे। ग्रामीण भारत की बुजुर्ग राजेश्वरी देवी जैसी अनगिनत महिलाओं को बैंक खाता खोलने के लिए संघर्ष करना पड़ता था। कम से कम एक बैंक खाते के साथ वित्तीय समावेशन प्राप्त करना भारत में एक महत्वपूर्ण चुनौती रही है।
भारत सरकार द्वारा प्रधानमंत्री जन धन योजना (पीएमजेडीवाई) 28 अगस्त 2014 को शुरू किए जाने के बाद स्थिति नाटकीय रूप से बदल गई, जिसका उद्देश्य सभी नागरिकों को उचित दूरी के भीतर किफायती वित्तीय सेवाएं प्रदान करना था। पीएमजेडीवाई के छह स्तंभ हैं: i) बैंकिंग सुविधाओं तक सार्वभौमिक पहुंच, ii) रुपे डेबिट कार्ड और ओवरड्राफ्ट सुविधा के साथ कम से कम एक बेसिक बैंकिंग खाता प्रदान करना, iii) वित्तीय साक्षरता, iv) क्रेडिट गारंटी फंड का निर्माण और ऋण तक पहुंच, v) सूक्ष्म बीमा, और vi) असंगठित क्षेत्र के लिए पेंशन सुविधा।
वर्ष 2025 तक भारत में बैंक खाता रखने वालों की तादाद बढ़कर 90% हो गयी, जो 2011 के आंकड़े से दोगुने से भी अधिक है और 79% के विश्वव्यापी औसत से बेहतर प्रदर्शन कर रहा है। विश्व बैंक ने बताया कि भारत ने छह वर्षों में अपने वित्तीय समावेशन लक्ष्यों को प्राप्त कर लिया, जिसमें अन्यथा 47 साल लगते। पीएमजेडीवाई के तहत “मेरा खाता, भाग्य विधाता” बैंकिंग सुविधाओं से वंचित आबादी के लिए वित्तीय स्वतंत्रता को सक्षम करने के लक्ष्य को दर्शाता है।
वित्तीय समावेशन का एक उल्लेखनीय सफर— आंकड़े खुद बोलते हैं
जुलाई 2025 तक 55.98 करोड़ खातों का आधार और 2.62 लाख करोड़ रुपये का लगातार बढ़ता जमा आधार, निम्न और मध्यम आय वर्ग (एलएमआई) के लोगों को औपचारिक बैंकिंग प्रणाली में लाने में इस जन आंदोलन की सफलता को दर्शाता है।
खास बात यह है कि 66.7% लाभार्थी ग्रामीण या अर्ध-शहरी क्षेत्रों से हैं, जो दूरदराज के क्षेत्रों में लोगों तक पहुंचने में पीएमजेडीवाई के व्यापक प्रभाव को रेखांकित करता है। लगभग 55.8% पीएमजेडीवाई खाताधारक महिलाएं हैं, जो बैंकिंग सेवाओं तक पहुंच में लगातार मौजूद लैंगिक अंतर को देखते हुए एक और उपलब्धि है।
पीएमजेडीवाई की सफलता इसके मिशन-मोड दृष्टिकोण, नियामक समर्थन, सार्वजनिक-निजी सहभागिता और बायोमेट्रिक पहचान के लिए आधार जैसे डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे के महत्व को उजागर करती है। अंतिम सिरे तक मौजूदगी रखने वाले 13 लाख से अधिक एजेंटों ने अपने आस-पास ग्राहकों में पारंपरिक बैंकिंग सेवाओं को मजबूत किया है।
जुलाई 2025 तक, प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना (पीएमजेजेबीवाई) के तहत लगभग 23.60 करोड़ लोगों ने कुल मिलाकर नामांकन किया था। इस बीच, प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना (पीएमएसबीवाई) में कुल 51 करोड़ मिलियन नामांकन हुए। इसके अलावा 7.6 करोड़ लोगों ने सेवानिवृत्ति कोष बनाने के लिए अटल पेंशन योजना (एपीवाई) योजना में नामांकन किया।
मार्च 2025 तक वित्तविहीन लोगों को वित्त प्रदान करने की पहल के तहत बैंकों ने सूक्ष्म एवं छोटे व्यवसायों को कुल 32.6 लाख करोड़ रुपये के 52 करोड़ ऋण स्वीकृत किए।
पीएमजेडीवाई: वित्तीय लचीलापन और ऋण तक पहुंच को बढ़ावा देना

औपचारिक बचत:

पीएमजेडीवाई ने बैंकिंग सुविधाओं से वंचित आबादी के वित्तीय लचीलेपन को बढ़ाने के लिए एक मजबूत आधारशिला रखी। एमएससी के शोध से पता चलता है कि 67% महिलाओं और 64% पुरुषों ने मुख्य रूप से भविष्य के लिए बचत करने के लिए बैंक खाते खोले। बचत व्यवहार में यह बदलाव लोगों के लिए उन वित्तीय झटकों का प्रबंधन करने के लिए महत्वपूर्ण है जो एलएमआई परिवारों को गरीबी में धकेल देते हैं। औसत बैंक जमा में चार गुना वृद्धि इस व्यवहार परिवर्तन को प्रमाणित करती है। दिलचस्प बात यह है कि पीएमजेडीवाई खातों में 12% वार्षिक जमा वृद्धि पिछले पांच वर्षों में 9% की समग्र बुनियादी बचत बैंक खाते की जमा राशि से अधिक रही।

औपचारिक ऋण:

पीएमजेडीवाई ने बचत को सक्षम किया, जबकि औपचारिक वित्तीय इतिहास के बिना लोगों को ऋण तक पहुंच प्रदान की। खाताधारक अब बचत पैटर्न दिखा सकते हैं, जो उन्हें वित्तीय संस्थानों से ऋण के लिए पात्र बनाता है। सबसे करीबी प्रॉक्सी मुद्रा ऋणों के तहत स्वीकृतियां हैं, जो वित्तीय वर्ष 2020 से वित्तीय वर्ष 2025 तक पांच वर्षों में 11.48% की चक्रवृद्धि वार्षिक दर से बढ़ीं। ऋण तक यह पहुंच परिवर्तनकारी है क्योंकि यह व्यक्तियों को अपनी आय बढ़ाने के लिए सशक्त बनाती है।

अब जन धन से जन समृद्धि?

जन धन ने जन समृद्धि के लिए मंच तैयार किया है, जहाँ उपयोगकर्ता उपयुक्त और किफायती सेवाओं के साथ अपने वित्तीय स्वास्थ्य को बढ़ा सकते हैं। एमएससी का शोध यह दर्शाता है कि लोग अपने खातों का उपयोग एक या दो सेवाओं के लिए करते हैं। इस प्रकार, हमें प्रासंगिक समाधानों को संशोधित और/या विकसित करके जुड़ाव में सुधार करने के तरीके खोजने होंगे जो अनुरूप समाधान, स्पष्ट संचार, विश्वसनीय शिकायत प्रक्रियाओं और लचीले अंतिम ढांचे के साथ एलएमआई समूह की आकांक्षाओं संबोधित करते हैं।
प्रदर्शन की निगरानी के जरिए आकलन महत्वपूर्ण है जैसे कि आईबीआई का वित्तीय समावेशन इंडेक्स। सूचकांक के उप-पैरामीटरों के बारे में विवरण साझा करना और विभिन्न राष्ट्रीय सर्वेक्षणों के माध्यम से उन्हें मजबूत करना अधिक समावेशी होगा।
भारत के फास्ट पेमेंट्स में एक वैश्विक लीडर के रूप में उभरने के कारण, हमें डिजिटल अर्थव्यवस्था में अपार अवसरों को अनलॉक करने के लिए अधिक पीएमजेडीवाई खाताधारकों को डिजिटल वित्तीय सेवाओं को अपनाने के लिए प्रयास करना चाहिए। अन्य संबंधित कार्यक्रमों के साथ तालमेल और स्थानीय एजेंसियों के साथ समन्वय, वंचित और हाशिए पर रहने वाले समुदायों के लिए डिजिटल अंतर को पाटने में मदद कर सकता है।
सच्चा वित्तीय समावेशन सिर्फ पहुंच से परे है; यह सही उत्पादों और सेवाओं, उच्च सेवा गुणवत्ता सुनिश्चित करने और औपचारिक वित्तीय प्रणाली के साथ सार्थक जुड़ाव को बढ़ावा देने के बारे में है। भारत जैसे विविधता से भरे देश के लिए वित्तीय समावेशन की यात्रा कठिन है। पीएमजेडीवाई ने लाखों लोगों को, विशेष रूप से हाशिए पर रहने वाले समुदायों को, बैंकिंग सेवाओं तक पहुंचने और राजेश्वरी देवी जैसे लोगों के लिए अपनी सामाजिक-आर्थिक स्थितियों में सुधार करने के लिए सशक्त बनाया है, जो कतार में सबसे आखिर में हैं।

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