टीएल बैठक : प्रगतिरत पीएम आवासों को 31 मार्च तक पूर्ण करने कलेक्टर ने दिए निर्देश 

गौरेला पेंड्रा मरवाही,। साप्ताहिक समय-सीमा की बैठक में कलेक्टर श्रीमती लीना कमलेश मंडावी ने पीएम जनमन के तहत स्वीकृत आवासों सहित प्रधानमंत्री आवास योजना की समीक्षा के दौरान डोर लेवल, छत लेवल एवं लेंटर हो चुके प्रगतिरत आवासों को 31 मार्च 2026 तक अनिवार्य रूप से पूर्ण करने के निर्देश दिए। उन्होंने जो आवास पूर्ण हो गए हैं, उनके अंतिम किश्त की पूरी राशि जारी करने और अप्रारंभ आवासों को शीघ्र प्रारंभ कराने कहा। उन्होंने पीएम जनमन योजना के क्रियान्वयन की समीक्षा के लिए नियुक्त नोडल अधिकारियों से आवास की प्रगति की पंचायतवार जानकारी ली तथा सभी विभागों की हितग्राहीमूलक योजनाओं से शत प्रतिशत हितग्राहियों को लाभान्वित करने निर्देश दिए।

कलेक्टर ने विभिन्न विभागों के अधिकारियों द्वारा पिछले सप्ताह स्कूलों एवं आंगनबाड़ी केंद्रों का किए गए निरीक्षण के तहत विद्यार्थियों एवं शिक्षकों की उपस्थिति, पढ़ाई का स्तर, मध्यान्ह भोजन की गुणवत्ता, शाला परिसर में साफ-सफाई, पेयजल, शौचालय, बिजली सुविधा आदि की जानकारी ली। उन्होंने जिला शिक्षा अधिकारी एवं सभी खण्ड शिक्षा अधिकारियों को हर सप्ताह 10 से 12 स्कूलों का निरीक्षण करने और कमियों में सुधार लाने कहा। साथ ही यह भी सुनिश्चित करने कहा कि शिक्षक समय का पाबंद रहें और समर्पित होकर बच्चों को पढ़ाएं।

कलेक्टर ने शाला परिसर में स्थित जीर्ण हो चुके अनुपयोगी भवन जो डिसमेंटल के लिए घोषित हो चुके हैं, को शीतकालीन अवकाश में डिसमेंटल कराने तथा जहां कहीं स्कूल भवनों के उपर से बिजली का तार गुजरा है, उसे अन्यत्र शिफ्ट कराने कहा। कलेक्टर ने विभागीय योजनाओं के क्रियान्वयन में प्रगति लाने और जनसमस्याओं एवं जनशिकायतों के लंबित प्रकरणों को शीघ्रता से निराकृत करने अधिकारियों को निर्देश दिए। बैठक में जिला पंचायत सीईओ मुकेश रावटे, प्रभारी अपर कलेक्टर अमित बेक, संयुक्त कलेक्टर दिलेराम डाहिरे, एसडीएम मरवाही देवेन्द्र सिरमौर, एसडीएम पेण्ड्रारोड विक्रांत अंचल सहित सभी विभागों के अधिकारी उपस्थित थे।

समर्थन मूल्य पर जिले में अब तक 2.65 लाख क्विंटल धान उपार्जित

गौरेला पेंड्रा मरवाही । समर्थन मूल्य पर किसानों से जिले में अब तक कुल 2 लाख 64 हजार 991.20 क्विंटल धान का उपार्जन किया जा चुका है। इनमें मोटा धान 2 लाख, 61 हजार 758 क्विंटल और पतला धान 3 हजार 233.20 क्विंटल शामिल है। प्राप्त जानकारी के अनुसार अब तक धान खरीदी केंद्र मेढ़ुका में 23 हजार 454 क्विंटल, लरकेनी में 22 हजार 864.80 क्विंटल, धनौली में 20 हजार 948.40 क्विंटल, सिवनी में 19 हजार 703.60 क्विंटल, लालपुर में 19 हजार 569.60 क्विंटल, पेण्ड्रा में 17 हजार 200.40 क्विंटल, भर्रीडांड़ में 16 हजार 918 क्विंटल, नवागांव पेण्ड्रा में 14 हजार 508.40 क्विंटल, निमधा में 13 हजार 414.40 क्विंटल, खोडरी में 12 हजार 522.40 क्विंटल, देवरीकला में 13 हजार 027.20 क्विंटल, गौरेला में 11 हजार 369.60 क्विंटल, मरवाही में 10 हजार 782 क्विंटल, परासी में 11 हजार 280.40 क्विंटल, तरईगांव में 11 हजार 289.20 क्विंटल, तेंदुमुड़ा में 9 हजार 182.40 क्विंटल, बंशीताल में 7 हजार 952.80 क्विंटल, कोडगार में 4 हजार 724 क्विंटल, जोगीसार में 2 हजार 356.80 क्विंटल और धान खरीदी केंद्र बस्ती में 1 हजार 922.80 क्विंटल धान खरीदा गया है।

चुनाव सुधार

स्वपन दासगुप्ता

पचास साल से भी अधिक समय पहले, भारतीय राजनीति के एक प्रतिष्ठित ब्रिटिश विद्वान ने व्यंग्यपूर्वक टिप्पणी की थी कि चुनाव उन चीज़ों में से एक हैं “जिन्हें भारतीय बहुत अच्छे से संपन्न करते हैं।” भारतीय लोकतंत्र के स्थायी रूप से स्थगित हो जाने या ‘निर्देशित’ हो जाने की आशंका (जो पूरी तरह से गलत नहीं थी) की पृष्ठभूमि में, चुनावी प्रक्रिया की पवित्रता को सार्वजनिक जीवन की एक उद्धारक विशेषता के रूप में देखा जाता था। लोकतंत्र के इस प्राथमिक स्तंभ की अंतिम पुष्टि 1977 में तब हुई, जब आपातकाल की छाया के बावजूद, भारत के मतदाताओं ने एक अधिनायकवादी शासन को वोट के जरिये सत्ता से बाहर कर दिय।

चुनाव आयोग (ईसीआई) की यह सुनिश्चित करने की क्षमता कि जनमानस की इच्छा विधायिकाओं में परिलक्षित हो, स्वतंत्रता प्राप्ति के पिछले सात दशकों में बार-बार परखी गई है। हालाँकि, मार्ग से विचलित होने के उदाहरण मौजूद हैं—इनमें 1972 का पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव और 1987 का जम्मू-कश्मीर चुनाव, दो उल्लेखनीय उदाहरण हैं— लेकिन, भारत का चुनावी अनुभव आमतौर पर राजनीतिक प्रणाली की वैधता बनाए रखने में सहायक रहा है।
जैसा कि सर्वाधिक मत से जीत की प्रणाली (फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट) में होता है, जो विधायी बहुमत को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाती है, ऐसे उदाहरण भी हैं, जब हारने वाले लोग हैरानी में रह गए जिनके चुनावी अभियान के अनुभव परिणाम से मेल नहीं खाते थे। 1971 में, एक पराजित पक्ष ने जोर देकर कहा कि सोवियत-निर्मित ‘अदृश्य स्याही’ के उपयोग ने इंदिरा गांधी को शानदार जीत हासिल करने में मदद की। उपग्रह द्वारा ईवीएम के हेरफेर के ऐसे ही अविश्वसनीय दावे 2009 के आम चुनाव के बाद भी सुने गए थे।
जो कभी साजिश सिद्धांतकारों का विशेषाधिकार हुआ करता था, वह पिछले वर्ष अब हाशिए का मुद्दा नहीं रहा है। अपनी पार्टी के संख्या-विश्लेषकों से प्रोत्साहित होकर, जिनकी भविष्यवाणियाँ परिणाम से भिन्न थीं, विपक्ष के नेता ने मतदाता सूचियों की सत्यता को चुनौती दी है। जोरदार दावे किए गए हैं कि चुनाव आयोग विशेष गहन पुनरीक्षण का उपयोग कर अल्पसंख्यक मतदाताओं को इस आधार पर बाहर करने पर विचार कर रहा है कि वे भारतीय नहीं भी हो सकते हैं। यह विवाद पश्चिम बंगाल के राजनीतिक दलों के बीच खींचतान का विषय बन चुका है और यह असम तथा अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में भी फैल सकता है।
चूंकि संविधान का अनुच्छेद 321 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम चुनाव आयोग को चुनाव के संचालन के संबंध में ‘विशेष क्षेत्राधिकार’ देता है, इसलिए चुनावी प्रक्रिया को राजनीतिक हस्तक्षेप से दूर रखा गया है। दशकों से चुनाव आयोग ने चुनावों की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए कई नवाचार पेश किए हैं। सबसे महत्वपूर्ण उपायों में आदर्श आचार संहिता शामिल है, जो अप्रिय राजनीतिक व्यवहार पर अंकुश लगाती है और ईवीएम ने वोटों में हेरफेर को और अधिक कठिन बना दिया है, हालांकि यह असंभव नहीं है। अब मतदान केंद्रों पर पुलिस और अर्धसैनिक बलों की तैनाती के लिए नियम मौजूद हैं। इसके अतिरिक्त, प्रौद्योगिकी के प्रसार के साथ, चुनाव आयोग मतदान केंद्रों में सीसीटीवी कैमरों पर जोर दे रहा है, ताकि मर्यादा बनी रहे तथा मतदान अधिकारियों और मतदाताओं को डराया-धमकाया न जा सके।
निश्चित रूप से, यह सच है कि इन नवाचारों में से कोई भी पूरी तरह से दोषरहित नहीं है। मतगणना केंद्रों सहित स्थानीय स्तर पर अक्सर बाहुबल का प्रभाव रहता है और इसके संभावित रूप से विकृत परिणाम हो सकते हैं। मतदान अधिकारियों द्वारा हेरफेर के अनुभवजन्य प्रमाणों को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। जब संसद में शीतकालीन सत्र के दौरान चुनाव सुधारों पर चर्चा होगी, तो संभव है कि देश को आदर्श लोकतांत्रिक आचरण के अन्य विचलनों के बारे में सुनने को मिले, जिनका चुनाव आयोग द्वारा समाधान किये जाने की आवश्यकता है।
लोकतांत्रिक परियोजना में एक महत्वपूर्ण हितधारक के रूप में, संसद को आम जनता के लिए अपने व्यापक चुनाव अनुभव को संकलित करने की आवश्यकता है। हालांकि, अच्छी राजनीति के बड़े लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होगी यदि राजनीतिक कार्यपालिका चुनाव आयोग के खिलाफ आम धमकियों, जिसमें शारीरिक नुकसान भी शामिल है, का इशारा करती है और सरकारी अधिकारियों—जिनके शालीन आचरण पर पूरी प्रणाली निर्भर करती है—को अपने संवैधानिक कर्तव्यों का पालन करने से रोकती है। पश्चिम बंगाल में चल रहे एसआईआर के दौरान सत्तारूढ़ दल का आचरण शर्मनाक है।
कहने की जरूरत नहीं है कि सटीक मतदाता सूची का अस्तित्व लोकतंत्र की मूल शर्त है। यदि वंचित समुदायों के सदस्य मतदान केंद्रों से दूर रहने के लिए मजबूर किए जाते हैं, तो इसका विरोध होना स्वाभाविक है। दुर्भाग्यवश, इस बात का विरोध काफी कम होता है, जब बड़ी संख्या में लोगों को मतदाता सूची में शामिल नहीं किया जाता है या दोहरी और तिहरी प्रविष्टियाँ होती हैं, जो परिणाम को प्रभावित कर सकती है। चुनाव आयोग ने मतदाता पहचान पत्र और तस्वीरों के माध्यम से धोखाधड़ी की समस्या को सुलझाने की कोशिश की है। हालांकि, धोखेबाजों ने मृत या स्थायी रूप से स्थानांतरित लोगों के नाम पर वोट देकर चुनाव प्रणाली को चकमा देने के तरीके भी निकाल लिए हैं। पूर्वी भारत में अतिरिक्त समस्या यह है कि मतदाता सूचियों में उन व्यक्तियों को जोड़ दिया गया है, जो भारतीय चुनावों में वोट देने के लिए अयोग्य हैं।
वर्तमान में जारी एसआईआर प्रक्रिया पहला अवसर नहीं है, जब चुनाव आयोग एक व्यापक मतदाता सूची तैयार कर रहा है। हालांकि इस बड़े पैमाने के कार्यक्रम के लिए कोई निश्चित समय सारिणी, जैसे हर 10 साल में एक बार या ऐसी कोई अन्य अवधि, निर्धारित नहीं है, लेकिन यह माना जाता है कि जब तक यह आवधिक पुनरीक्षण नहीं किया जाएगा, चुनाव परिणाम जनभावना को सही ढंग से प्रतिबिंबित नहीं करेंगे।
20वीं सदी के शुरुआती दशकों में आयरलैंड के संदर्भ में कहा जाता था कि लोगों को ‘जल्द वोट दें और अक्सर वोट दें’ की सलाह दी जाती थी। एक उत्साही शोधकर्ता के लिए यह दस्तावेज बनाने लायक हो सकता है कि भारत के कुछ हिस्सों में किस प्रकार की अभिनव प्रथाएँ प्रचलित हैं, जैसे मृत व्यक्तियों द्वारा मतदान या एक उम्मीदवार के मतों का उसके प्रतिद्वंद्वी के खाते में सहजता से स्थानांतरित हो जाना। एसआईआर रचनात्मक राजनीति के इन सभी उदाहरणों को इतिहास में नहीं बदल देगा, लेकिन यह वैश्विक भरोसे में थोड़ी और दृढ़ता जोड़ेगा कि भारत अपनी चुनाव प्रक्रियाओं को अच्छे से संचालित करता है। आशा यह है कि आने वाले दशकों में किसी भी राज्य या क्षेत्र के बारे में यह नहीं कहा जाएगा कि वहाँ चुनाव नहीं होते, बल्कि उन्हें ‘प्रबंधित’ किया जाता है।

उल्लास नवभारत साक्षरता मूल्यांकन परीक्षा 7 दिसम्बर को किया जायेगा

गौरेला पेंड्रा मरवाही । उल्लास नवभारत साक्षरता कार्यक्रम के तहत बुनियादी साक्षरता एवं संख्यात्मक ज्ञान मूल्यांकन परीक्षा 7 दिसम्बर रविवार को सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक आयोजित किया गया है। जिले में परीक्षार्थियों के सुविधा के अनुसार नजदीक के प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालयों में 386 परीक्षा केन्द्र बनाये गयें है। परीक्षा केन्द्रो की माॅनिटिरिंग हेतु जिला एवं विकास खण्ड स्तर पर अधिकारियो, कर्मचारियों की ड्यूटी लगाई गई है।
उल्लास नवभारत साक्षरता कार्यक्रम के अंतर्गत 15 वर्ष से अधिक के ऐसे महिला-पुरुष शिक्षार्थियों को सम्मिलित किया जाना है जो शिक्षा की मुख्य धारा में सम्मिलित नही है। शिक्षार्थियों को प्रश्न पत्र हल करने के लिए 3 घटें का समय दिया जायेगा। प्रश्न पत्र के तीन भाग है पहला भाग – पढना, दूसरा भाग – लिखना, तीसरा भाग – गणित। प्रत्येक भाग 50 अंक का होगा प्रत्येक भाग में न्यूनतम 20 अंक प्राप्त करने वाले शिक्षार्थी सफल माने जायेगे। सफल परीक्षर्थियों को राष्ट्रीय मुक्त विद्यालय शिक्षा संस्थान द्वारा प्रमाण-पत्र प्रदाय किया जाएगा।

नवभारत उल्लास साक्षरता कार्यक्रम परासी में निकली जन-जागरूकता रैली  

मरवाही/परासी । नवभारत उल्लास साक्षरता कार्यक्रम के अंतर्गत निरक्षरों को साक्षर बनाने के महाअभियान के तहत, कल (रविवार) को आयोजित होने वाली महापरीक्षा के संदर्भ में आज ग्राम परासी में एक जन-जागरूकता रैली का आयोजन किया गया। रैली का मुख्य उद्देश्य ग्रामवासियों को साक्षरता महापरीक्षा के प्रति जागरूक करना तथा अधिक से अधिक लोगों तक इस महत्वपूर्ण अभियान की जानकारी पहुँचाना रहा।

विद्यार्थियों और शिक्षकों ने दिखाया उत्साह

इस उत्साहपूर्ण रैली में कन्या पूर्व माध्यमिक शाला परासी, माध्यमिक शाला बालक परासी, और बालक प्राथमिक विद्यालय परासी के सभी शिक्षकगण एवं विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। सभी ने मिलकर गांव के लोगों को साक्षरता के महत्व से अवगत कराया।

मार्गदर्शन में विशेष योगदान

रैली के सफल संचालन और मार्गदर्शन में शिक्षकों ने विशेष योगदान दिया, जिनमें प्रमुख रूप से शामिल थे ।
कुवांरे लाल गुप्ता, प्रधान पाठक, पूर्व माध्यमिक शाला परासी पूर्व हेड मास्टर, बालक प्राथमिक शाला परासी, प्रशांत कुमार राय, प्राथमिक शाला परासी, हेड मास्टर मृगेन्द्र सिंह राणा, कन्या माध्यमिक शाला परासी, लोभान कुमार केवट, मिडिल स्कूल परासी, दुर्गेश कुमार यादव, मा.शा. परासी, कुसुम उरेती, प्रा.शा. परासी, रीना पोट्टाम, मा.शा. क. परासी, बैगा ,गोंदिल यादव, सभी शिक्षकों और विद्यार्थियों के सहयोग से यह जन-जागरूकता रैली सफलतापूर्वक संपन्न हुई।

 

केंद्रीय राज्यमंत्री तोखन ने एकता नगर में आयोजित Sardar@150 यूनिटी मार्च – राष्ट्रीय पदयात्रा के समापन समारोह में की सहभागिता

दिल्ली । केंद्रीय आवासन एवं शहरी कार्य राज्य मंत्री सह बिलासपुर लोकसभा सांसद तोखन साहू आज एकता नगर में आयोजित Sardar@150 यूनिटी मार्च – राष्ट्रीय पदयात्रा के भव्य समापन समारोह में सहभागिता हेतु माननीय उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन के साथ दिल्ली से गुजरात पहुंचे तथा कार्यक्रम उपरांत उपराष्ट्रपति महोदय के साथ ही वापस लौटे।

यह राष्ट्रीय समारोह लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की 150वीं जयंती वर्ष पर आयोजित पदयात्रा के ऐतिहासिक समापन का अवसर था। कार्यक्रम में सरदार पटेल द्वारा 560 से अधिक रियासतों के एकीकरण के माध्यम से अखंड भारत की मजबूत नींव रखने के अतुलनीय योगदान को स्मरण किया गया।

समारोह के दौरान यह भी रेखांकित किया गया कि सरदार पटेल का एकता, राष्ट्रनिर्माण, आत्मविश्वास और सशक्त भारत का स्वप्न आज प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में नई ऊर्जा और संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है।
प्रधानमंत्री जी के आत्मनिर्भर भारत अभियान, विकसित भारत @2047 तथा युवा-शक्ति के सशक्तिकरण पर केंद्रित विज़न ने सरदार साहब के विचारों को आधुनिक भारत में गति प्रदान की है।

कार्यक्रम में इस बात पर भी जोर दिया गया कि सरदार पटेल की विचारधारा से प्रेरित होकर देश का युवा आत्मनिर्भर, नवाचार-आधारित तथा विकसित भारत के निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

इस अवसर पर माननीय उपराष्ट्रपति श्री सी. पी. राधाकृष्णन, गुजरात के राज्यपाल श्री आचार्य देवव्रत, गुजरात के मुख्यमंत्री श्री भूपेंद्र पटेल, केंद्रीय मंत्री श्री राजीव रंजन सिंह, केंद्रीय मंत्री डॉ. मनसुख मांडविया, केंद्रीय राज्य मंत्री श्रीमती राक्षा खड़से सहित अनेक विशिष्ट अतिथि उपस्थित रहे।

जन आंदोलन को पूर्ण समर्थन : लिंगीयाडीह के गरीबों का मकान तोड़ना शासन की तानाशाही नीति – त्रिलोक

बिलासपुर ।  50 वर्षों से ज्यादा समय से घर, मकान, दुकान बनाकर रहने एवं अपने जीवको पiर्जन् करने वाले स्थानीय लोगों को हटाने के लिए नोटिस देना, पूर्व में 173 मकान तोड़ना, जिला प्रशासन के तानाशाही पूर्ण नीति है, लिंगीयiडीह के गरीबों आवासहीनौ, बेलतरा विधानसभा बिलासपुर के आम जन मानस के सुख दुख के लिए हम लोग वर्षों से लड़ रहे हैं, आपके साथ कंधे से कंधा मिलाकर इस आंदोलन को मदद करेंगे, गरीबों के मकान को तोड़ने से बचiने का भरसक का प्रयास किया जाएगा, यदि मैं विधायक रहता तो यह स्थिति निर्मित नहीं होती, यह बातें बिलासपुर जिले के लोकप्रिय कांग्रेस नेता त्रिलोक चंद्र श्रीवास, राष्ट्रीय समन्वयक- अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने आज लिंगीयiडीह में अतिक्रमण से प्रभावित परिवारों एवं जनप्रतिनिधियों द्वारा किए जा रहे धरना को अपना पूर्ण समर्थन देते हुए व्यक्त किया, इस अवसर पर उन्होंने कहा कि इस विषय में किया जा रहे जन आंदोलन को उनका एवं उनके सहयोगियों का पूर्ण समर्थन प्राप्त रहेगा, गरीबों एवं आम जनता के लिए वह पिछले 25 वर्ष ज्यादा समय से संघर्ष कर रहे है आगे भी उनकी लड़ाई जारी रहेगी, इस अवसर पर  दिलीप पाटिल  मानिकपुरी  मिश्रा पंडित जितेंद्र शर्मा आयुष सिंह राज ठाकुर पवन सिंह प्रदीप सिंह ठाकुर सोनू कश्यप विनोद यादव रामेश्वर केसरी अमित सोनकर राजू कश्यप दीपक नादम सहित क्षेत्र के सैकड़ो रहवासी उपस्थित थे l

श्रमिक अधिकारों के लिए संघर्ष से लेकर राष्ट्र निर्माण हेतु अभूतपूर्व योगदान करने वाले डॉ. भीमराव अंबेडकर

अर्जुन राम मेघवाल

आज, हम एक विराट व्यक्तित्व के स्वामी और आधुनिक मानव समाज की दिशा निर्धारित करने वाले प्रगतिशील उपायों के पुरोधा बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर का 70वां महापरिनिर्वाण दिवस मना रहे हैं। एक विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री, दार्शनिक, समाज सुधारक और इन सबसे अधिक एक राष्ट्र-निर्माता के रूप में उनके अथक प्रयासों ने आधुनिक भारत की नींव रखी। उन्होंने केवल भारत के संविधान का मसौदा ही तैयार नहीं किया बल्कि एक ऐसे समावेशी और सशक्त राष्ट्र का खाका भी प्रस्तुत किया जहां प्रत्येक नागरिक की गरिमा की रक्षा हो और सभी को समान अवसर प्राप्त हो सके। इन मूलभूत मूल्यों से प्रेरित होकर मोदी सरकार ने जन कल्याण और सुशासन को बढ़ावा देने वाली कई पहलें की हैं। 27 नवंबर, 2025 को पेरिस स्थित यूनेस्को (UNESCO) मुख्यालय में भारत के संविधान की 75वीं वर्षगांठ के अवसर पर संपूर्ण विश्व डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर की आवक्ष प्रतिमा के अनावरण का साक्षी बना। विश्व के गणमान्य व्यक्तियों के समक्ष यह प्रतिमा न केवल भारत के एक नेता के प्रति श्रद्धांजलि के रूप में बल्कि न्याय के एक सार्वभौमिक प्रतीक के रूप में खड़ी है। पट्टिका पर भारत के संविधान का शिल्पकार लिखा है, फिर भी ये शब्द उस व्यक्ति की विरासत का पूरी तरह से उल्लेख नहीं कर सकते, जिसने न केवल भारत के संविधान का मसौदा तैयार किया, बल्कि एक पूरे राष्ट्र को समग्रतः आकार देने में मदद की।

अपने पूरे जीवनकाल में, बाबा साहेब डॉ. अंबेडकर ने श्रमिकों के अधिकार और उनके कल्याण की वकालत करते हुए न्याय के लिए संघर्ष किया। गोलमेज सम्मेलन (Round Table Conference) में दलित वर्गों (Depressed Classes) के प्रतिनिधि के रूप में उन्होंने जीवन निर्वाह मजदूरी, काम करने की उचित स्थिति, दमनकारी जमींदारों से किसानों की मुक्ति और दबे-कुचले लोगों को प्रभावित करने वाली सामाजिक बुराइयों के उन्मूलन की पुरजोर वकालत की। उन्होंने व्यक्तिगत रूप से श्रमिकों और दलितों की पीड़ा को देखा था। बंबई में, वह बंबई डेवलपमेंट डिपार्टमेंट की एक कमरे वाली चॉल (tenements) में मिल मजदूरों के साथ 10 साल से अधिक समय तक रहे, जहाँ कोई आधुनिक सुविधाएँ नहीं थीं और

प्रत्येक मंजिल पर सभी उद्देश्यों के लिए केवल एक शौचालय और एक नल था। इन परिस्थितियों ने उन्हें श्रमिकों के जीवन को काफी नजदीक से समझने का अवसर दिया। उन्होंने आम जनता को एकजुट किया और 1936 में भूमिहीन लोगों, गरीब काश्तकारों, कृषकों और श्रमिकों के कल्याण हेतु एक व्यापक कार्यक्रम के साथ इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी (ILP) की स्थापना की। 17 सितंबर, 1937 को बंबई विधानसभा के पुणे सत्र के दौरान, उन्होंने कोंकण में खोती भूमि कार्यकाल प्रणाली को समाप्त करने के लिए एक विधेयक पेश किया। 1938 में, उन्होंने बंबई में काउंसिल हॉल तक किसानों के मार्च का नेतृत्व किया और किसानों, श्रमिकों और भूमिहीनों के लोकप्रिय नेता बन गए। वह कृषि काश्तकारों की दासता (बंधुआ मजदूरी) को समाप्त करने के लिए विधेयक पेश करने वाले पहले भारतीय विधायक थे। उन्होंने औद्योगिक विवाद विधेयक (Industrial Disputes Bill), 1937 का भी कड़ा विरोध किया क्योंकि इसमें श्रमिकों के हड़ताल करने के अधिकार में कटौती की गई थी। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अनिश्चित वैश्विक व्यवस्था के दौर में डॉ. अंबेडकर ने वायसराय की कार्यकारी परिषद के श्रम सदस्य के रूप में भारत में मजदूरों के कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया। विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद अर्थव्यवस्था में सुधार होने और उद्योगों का विस्तार होने पर उद्यमियों को समृद्धि के अवसर मिले, लेकिन श्रमिकों को उनका उचित हिस्सा नहीं दिया गया। उस समय डॉ. अंबेडकर ने श्रमिकों के कल्याण के लिए महत्वपूर्ण उपाय पेश किए, जिससे सरकार की श्रम नीति की नींव पड़ी। उन्होंने श्रमिकों से जुड़े जटिल मुद्दों का बहुत दक्षता के साथ समाधान निकाला जिससे उन्हें कर्मचारियों व नियोक्ताओं दोनों से सम्मान प्राप्त हुआ। वर्ष 1943 में बंबई से आकाशवाणी से किए गए अपने संबोधन में डॉ. अंबेडकर ने श्रमिकों के लिए स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व पर आधारित जीवन की उचित स्थिति सुरक्षित करने का आग्रह किया। उनके प्रयासों से श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाने में मदद मिली। उन्होंने प्रमुख श्रम कानूनों के माध्यम से श्रमिकों के कल्याण हेतु अहम योगदान किया जिसमें युद्ध चोट (मुआवजा बीमा) विधेयक, असुरक्षित निरीक्षणों के कारण मिलों में होने वाली मृत्यु पर रोक लगाने से संबंधित बॉयलर (संशोधन) विधेयक 1943, भारतीय खान और ट्रेड यूनियन संशोधन विधेयक, खनिक मातृत्व लाभ संशोधन विधेयक, कोयला खान सुरक्षा (स्टोविंग) संशोधन विधेयक और कामगार मुआवजा संशोधन विधेयक शामिल हैं।

9 दिसंबर 1943 को, डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने धनबाद कोयला खदानों का दौरा किया और खदानों के संचालन व श्रम स्थितियों का निरीक्षण करने के लिए जमीन से 400 फीट नीचे गए। इसके परिणामस्वरूप जनवरी 1944 का कोयला खान श्रम कल्याण अध्यादेश (Coal Mine Labour Welfare Ordinance) आया, जिससे श्रमिकों के कल्याण के लिए एक कोष बनाया गया। उन्होंने कोयले की खानों से निकाले गए कोयले पर कर को दोगुना करके इस कोष को मजबूत किया, जिससे खनिकों के लिए बेहतर स्वास्थ्य और सुरक्षा उपाय सुनिश्चित हुए। 8 नवंबर 1943 को, उन्होंने भारतीय ट्रेड यूनियन (संशोधन) विधेयक भी पेश किया, जिसमें नियोक्ताओं के लिए ट्रेड यूनियनों को मान्यता देना अनिवार्य कर दिया गया। 8 फरवरी 1944 को कोयला खदानों में महिलाओं के जमीन के भीतर काम पर से प्रतिबंध हटाने के विषय पर विधानसभा में बहस के दौरान डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने कहा, "मुझे लगता है कि यह पहली बार है कि किसी भी उद्योग में लैंगिक आधार पर भेदभाव के बिना समान काम के लिए समान वेतन का सिद्धांत स्थापित किया गया है। यह देश के लिए एक ऐतिहासिक क्षण था। माइन्स मैटरनिटी बेनिफिट (संशोधन) बिल 1943 के माध्यम से उन्होंने मातृत्व लाभ को मजबूत किया और उन्हें अनुपस्थिति के कारण आर्थिक दंड से बचाने का प्रावधान किया। वर्ष 1945 में उन्होंने अधिनियम में और संशोधन किए ताकि महिलाओं को प्रसव से दस सप्ताह पहले जमीन के भीतर कार्य करने से बचाया सके और उनके लिए प्रसव से दस सप्ताह पहले और चार सप्ताह बाद कुल मिलाकर चौदह सप्ताह का मातृत्व अवकाश सुनिश्चित किया जा सके।

26 नवंबर 1945 को नई दिल्ली में भारतीय श्रमिक सम्मेलन को संबोधित करते हुए, उन्होंने श्रमिकों के प्रति सरकार के दायित्वों की समीक्षा की और श्रमिकों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर के श्रम कानून की तत्काल आवश्यकता पर बल दिया। प्रगतिशील श्रम कल्याण कानून की आवश्यकता पर बल देते हुए, उन्होंने कहा:कोई यह कह सकता है कि अंग्रेजों को श्रम कानून की एक उचित संहिता बनाने में 100 साल लग गए, किंतु यह कोई तर्क नहीं है कि हमें भी भारत में 100 साल लगने चाहिए। इतिहास का अध्ययन केवल इस दृष्टि से नहीं किया जाना चाहिए कि दूसरे देशों की गलतियों की नकल कितनी अच्छी तरह की जाए। हम इतिहास का अध्ययन इसलिए करते हैं ताकि यह जान सकें कि लोगों ने क्या गलतियां की है और उनसे कैसे बचा जा सकता है। इतिहास हमेशा एक उदाहरण नहीं होता। अक्सर यह एक चेतावनी होता है। अगले दिन उसी सम्मेलन में, उन्होंने कारखानों में काम के घंटे घटाकर 48 घंटे प्रति सप्ताह करने, वैधानिक औद्योगिक कैंटीन शुरू करने और कामगार मुआवजा अधिनियम, 1934 में संशोधन करने के लिए कानून प्रस्तावित किया। उन्होंने न्यूनतम मजदूरी और भारतीय ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926 में संशोधन के लिए कानूनों का मसौदा तैयार करने की योजना भी घोषित की। 21 फरवरी 1946 को, डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने साप्ताहिक काम के घंटों को घटाकर 48 करने, ओवरटाइम दरों को तय करने और सवैतनिक अवकाश प्रदान करने के लिए कारखाना (संशोधन) विधेयक पेश किया। प्रवर समिति (select committee) द्वारा समीक्षा के बाद, अंबेडकर द्वारा समर्थित यह ऐतिहासिक कानून 4 अप्रैल 1946 को पारित किया गया था।

अभ्रक खनन उद्योग में कल्याणकारी गतिविधियों के लिए एक कोष बनाने के लिए उनके द्वारा पेश किया गया अभ्रक खान श्रम कल्याण कोष विधेयक (Mica Mines Labour Welfare Fund Bill), 15 अप्रैल 1946 को पारित किया गया था। इसने बाल और महिला मजदूरों के लिए सुविधाओं और काम करने की स्थितियों में सुधार किया, जिसमें काम के घंटे और मजदूरी के मुद्दे शामिल थे। डॉ. अंबेडकर ने 11 अप्रैल 1946 को न्यूनतम वेतन विधेयक (Minimum Wages Bill) भी पेश किया, जिसमें समान नियोक्ता-श्रम प्रतिनिधित्व वाली सलाहकार समितियों और बोर्डों का प्रस्ताव था। बाद में 9 फरवरी

1948 को इसे कानून का रूप दिया गया। डॉ. अंबेडकर ने कम्युनिस्टों के नेतृत्व वाले श्रमिक आंदोलन का विरोध किया, उन्होंने उत्पादन के सभी साधनों को नियंत्रित करने के मार्क्स के सर्वसत्तावादी दृष्टिकोण (totalitarian approach) को खारिज कर दिया। वह मार्क्स के इस विचार से असहमत थे कि निजी संपत्ति को खत्म करने से गरीबी और पीड़ा समाप्त हो जाएगी। अपने निबंध  बुद्ध या कार्ल मार्क्स में, वह लिखते हैं:—

क्या कम्युनिस्ट यह कह सकते हैं कि अपने मूल्यवान उद्देश्य को प्राप्त करने में उन्होंने अन्य मूल्यवान उद्देश्यों को नष्ट नहीं किया है? उन्होंने निजी संपत्ति को नष्ट कर दिया है। यह मानते हुए कि यह एक मूल्यवान उद्देश्य है, क्या कम्युनिस्ट यह कह सकते हैं कि इसे प्राप्त करने की प्रक्रिया में उन्होंने अन्य मूल्यवान उद्देश्यों को नष्ट नहीं किया है? अपने उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए उन्होंने कितने लोगों को मारा है। क्या मानव जीवन का कोई मूल्य नहीं है? क्या वे मालिक की जान लिए बिना संपत्ति नहींले सकते थे? संविधान का मसौदा तैयार करते समय, डॉ. अंबेडकर ने एकसमान कानून और अंतरराष्ट्रीय मानकों के साथ संरेखण सुनिश्चित करने के लिए श्रम को समवर्ती सूची (Concurrent List) में रखा। उनकी दूरदर्शिता ने संविधान में बंधुआ मजदूरी को अवैध घोषित करके उसे समाप्त कर दिया। हमारे दूरदर्शी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा दिए गए "Reform, Perform and Transform" मंत्र से प्रेरित होकर तथा डॉ. अंबेडकर के मूल्यों का अनुसरण करते हुए हमारी सरकार ने चार व्यापक श्रम संहिताओं (labour codes)—मजदूरी, औद्योगिक संबंध, सामाजिक सुरक्षा और कल्याण, और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और काम करने की स्थिति—को लागू किया है। इन सुधारों का उद्देश्य सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करना, श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा करना, उत्पादकता को बढ़ावा देना, नौकरियां पैदा करना और वर्ष 2047 तक विकसित भारत की दिशा में भारत की आर्थिक समृद्धि को मजबूत करना है। फरवरी 2019 में शुरू की गई प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन योजना, असंगठित श्रमिकों के लिए वृद्धावस्था सुरक्षा प्रदान करती है, तथा मातृत्व संशोधन अधिनियम, 2017 द्वारा मातृत्व अवकाश को 12 से बढ़ाकर 26 सप्ताह किया गया है और क्रेच सुविधाओं को अनिवार्य बनाया गया है। श्रमेव जयते की स्थायी भावना से निर्देशित होकर हम राष्ट्र निर्माण में श्रमिकों के अनगिनत योगदान को सम्मानित करते हैं। परम पूज्य बाबासाहेब डॉ. अंबेडकर का महापरिनिर्वाण दिवस हमें इस महान राष्ट्र-निर्माता के दृष्टिकोण और कार्यों पर विचार करने का एक उपयुक्त अवसर प्रदान करता है। उनके आदर्श हमें राष्ट्र की विकास यात्रा को तीव्रतर बनाने तथा वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सदैव प्रेरित करते रहेंगे।

अर्जुन राम मेघवाल

लेखक केंद्रीय विधि एवं न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और संसदीय कार्य मंत्री, भारत सरकार है।

डाक विभाग ने जन समस्याओं के निवारण हेतु अदालत का आयोजन किया

बिलासपुर । भारतीय डाक विभाग के द्वारा जन समस्याओं के निवारण के तत्वाधान में दिनांक 08.12.2025 को सुबह 11:00 बजे कार्यालय अधीक्षक डाकघर बिलासपुर संभाग, बिलासपुर में डाक अदालत का आयोजन किया गया है जिसमे उपभोक्ताओं की समस्याओं की सुनवाई होगी तथा उनका निराकरण किया जायेगा | इस दौरान काउंटर सेवा, मनी आर्डर, बचत बैंक 1. मूल्य देय वस्तुएं, डाक जीवन बीमा एवं ग्रामीण डाक जीवन बिगा, स्पीड पोस्ट वस्तुएं व विदेशी डाक वस्तुएं आदि से जुड़ी समस्याओं की सुनवाई होगी। किसी उपभोक्ता को इन मामलों में शिकायत हो और उसका अभी तक संतोष जनक जवाब नहीं मिला हो तो वह शिकायत का ब्यौरा 05.12.2025 तक कार्यालय अधीक्षक डाकघर बिलासपुर संभाग, बिलासपुर को प्रेषित कर सकते हैं ।

वित नियंत्रक शंकर झा द्वारा रचित छ.ग. भण्डार क्रय नियम एवं जेम पोर्टल से शासकीय क्रय पुस्तक का विमोचन

रायपुर । पुलिस मुख्यालय नवारायपुर में पदस्थ राज्य वित सेवा के वित नियंत्रक  शंकर झा द्वारा  छ.ग. भण्डार क्रय नियम एवं जेम पोर्टल से शासकीयक्रय नामक पुस्तक लिखी गई है यह पुस्तिका शासकीय सामाग्रीयों की खरीदी में काफीउपयोगी व मार्गदर्शी है। इस मार्ग दर्शिका में भण्डार क्रय नियम के अद्यतनप्रावधानों के साथ-साथ छत्तीसगढ़ भंडार क्रय नियम-2002 भण्डार से संबंधित वित्तीय संहिता के प्रावधान पुरानी भण्डार सामाग्री का निराकरण ]जीएसटी में स्त्रोत पर कटौती (टीडीएस) के संबंध में मार्गदर्शिका] शासकीय दूरभाष सुविधा शासकीय वाहन व्यवस्था] Purchasefrom GEM Portal वित्तीय अधिकार भाग-1 2024 भी समाहित है।  पुलिस महानिदेशक  अरुण देव गौतम द्वारापुलिस मुख्यालय के कान्फ्रेंस हॉल में उक्त पुस्तिका का विमोचन किया गया। इस अवसरपर अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक एसआरपी कल्लूरी अमित कुमार अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक प्रदीप गुप्ता अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक एवं  समस्त पुलिस महानिरीक्षक] उप पुलिस महानिरीक्षक] सहायक पुलिस महानिरीक्षक तथा अन्य अधिकारी गण उपस्थित रहें।

Editorial : नारी शक्ति से विकास: महिलाओं के नेतृत्व वाली प्रगति पर फोकस करने की ज़रुरत

Editorial : लैंगिक समानता और महिला सशक्तिकरण हमारे उज्जवल आज और बदलते कल के लिए बेहद ज़रुरी आधार है। तेज़ रफ्तार से आगे बढ़ते इस वक्त में हम लैंगिक समानता हासिल करने के लिए एक और शताब्दी तक इंतज़ार नहीं कर सकते। नारी शक्ति और भारत की विश्व को सभ्यतागत देन, महिलाओं को देवी के रूप में देखने की मूल अवधारणा को अब महज़ एक प्रतीक से आगे ले जाकर व्यावहारिक जीवन में लाना होगा और महिलाओं के प्रति सम्मान की हमारी विरासत को महिलाओं के नेतृत्व वाले सतत् विकास के मार्ग पर ले जाना होगा।
जब आधी मानवता की स्वतंत्रता और जीवन जीने के अवसर बढ़ते हैं, तो नए समाज में फिर से एक नई ऊर्जा का संचार होता है। लैंगिक समानता अपने आप में एक आदर्श विचार है, और सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, तकनीकी और पर्यावरणीय प्रगति का एक शक्तिशाली कारक भी है। मैकिन्से ग्लोबल इंस्टीट्यूट की 2015 की रिपोर्ट, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों पर आधारित वर्ष 2024 का विश्लेषण और ईवाय का इंडिया@100 कार्य, मिलकर एक ठोस आर्थिक तर्क पेश करते हैं: लैंगिक अंतर को कम करने से सकल घरेलू उत्पाद में 20 से 30% की वृद्धि हो सकती है और यह भारत के लिए 2047 तक 28 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के लिए बेहद ज़रुरी है।
भारत एक जनसांख्यिकीय दौर से गुज़र रहा है। हमारी युवा आबादी का तभी लाभ उठाया जा सकता है, जब वह महिलाओं के लिए फायदेमंद हो। प्रजनन क्षमता घट रही है और लड़कियों तथा युवतियों की महत्वाकांक्षाएँ बढ़ रही हैं, भारत अब उच्च शिक्षा में लगभग बराबरी पर है और करीब 43% स्टेम छात्राएँ हैं। कई सालों तक महिलाओं के काम को अनौपचारिक और अदृश्य बनाए रखने के बाद, आखिरकार महिलाओं की श्रमशक्ति में भागीदारी फिर से बढ़ने लगी है और अब इसे बेहतर गुणवत्ता, औपचारिक और भविष्य के लिए तैयार नौकरियों में तब्दील होना चाहिए।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार की एक खास विशेषता ऐसे प्रमुख कार्यक्रमों को लक्षित करना है, जिनमें महिलाएँ प्रमुख लाभार्थी हैं। इसके अलावा बुनियादी ढाँचे, स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े ऐसे कार्यक्रम भी सरकार के फोकस में हैं, जो लैंगिक भेदभाव के प्रति संवेदनशील हैं। छात्रवृत्ति, छात्रावास और आरक्षित सीटों ने उच्च एवं तकनीकी शिक्षा में महिलाओं की मौजूदगी को बढ़ाया है और ज्ञान, स्वास्थ्य, हरित और देखभाल अर्थव्यवस्थाओं में उनके लिए नए रास्ते खोले हैं। डिजिटल मिशन और ग्रामीण कार्यक्रमों ने करोड़ों महिलाओं को प्रशिक्षित किया है और उनके हाथों में किफायती डेटा वाले स्मार्टफोन और जन धन खाते दिए हैं, जिससे उन्हें सूचना, बाज़ार और सेवाओं तक सीधी पहुँच मिली है।
प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना, प्रधानमंत्री मुद्रा, स्वच्छ भारत और प्रधानमंत्री आवास जैसी प्रमुख योजनाओं ने करोड़ों महिलाओं को स्वच्छ ऊर्जा, ऋण तक पहुँच, स्वच्छता और सुरक्षित आवास जैसी सुविधाएं दी हैं, जबकि सुकन्या समृद्धि और लखपति दीदी जैसी योजनाओं ने उनके बैंक खातों में प्रत्यक्ष लाभ अंतरण और उनकी आय में बढ़ोत्तरी को मुमकिन बनाया है। अब अगले स्तर पर उन्हें निर्णायक रूप से लाभार्थी से अधिकार पति, यानी अधिकारों के प्राप्तकर्ता से पूर्ण अधिकार धारक और अर्थव्यवस्था तथा समाज में फैसला लेने वाली महिला के रूप में स्थापित करना होगा। 2030 तक लैंगिक समानता पर सतत् विकास लक्ष्य 5 को प्राप्त करने का यही असल सार है।
भारत में अंतर्संबंध का अर्थ है, कि कई महिलाओं को गरीबी, जाति, जनजाति, धर्म, दिव्यांगता या स्थान के कारण कई स्तरों पर मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। तीन तलाक के उन्मूलन ने मुस्लिम महिलाओं के विवाह अधिकारों को मज़बूत किया है। जनजातीय पृष्ठभूमि की महिला, द्रौपदी मुर्मू का भारत के राष्ट्रपति के रूप में चुनाव इस बात का प्रतीक है कि हाशिए पर रहने वाले समाज की महिला एक गणतंत्र में किस ऊँचाई तक पहुँच सकती है और लैंगिक और सामाजिक न्याय के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को और गहरा कर सकती है। मौजूदा वक्त में हमें जिस कल का निर्माण करना है, वह ऐसा होना चाहिए, जिसमें विकास के ऐसे उदाहरण, असाधारण न होकर, व्यवस्था का हिस्सा हों और व्यापक रुप से दिखाई दें।
हिंसा से मुक्ति, एक लैंगिक समानता वाले समाज का अनिवार्य आधार बनी हुई है। घरेलू दुर्व्यवहार और मानव तस्करी से लेकर कार्यस्थल पर उत्पीड़न और ऑनलाइन घृणा तक, महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ हर प्रकार की हिंसा को खत्म करना, हमारे एजेंडे में सबसे ऊपर होना चाहिए, साथ ही महिलाओं के स्वास्थ्य और यौन तथा प्रजनन अधिकारों पर निरंतर काम करना चाहिए, जो स्वायत्तता और सम्मान की गारंटी देते हैं।
राजनीतिक आवाज़ और नेतृत्व हर दूसरे हस्तक्षेप के प्रभाव को कई गुना बढ़ा देते हैं और महिलाओं को भविष्य के नियमों को आकार देने की ताकत देते हैं। जमीनी स्तर पर, पंचायतों और शहरी स्थानीय निकायों में 33% से 50% आरक्षण ने 15 लाख महिला नेताओं को जन्म दिया है। लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं में एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने वाला नारी शक्ति वंदन अधिनियम, कानून निर्माण और शासन में वास्तविक समानता की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। जैसा कि हाल ही में बिहार में देखा गया, महिलाएँ चुनावी नतीजों को भी नया रूप दे रही हैं, जहाँ जागरूक मतदाता सुरक्षा, गतिशीलता, शिक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका के क्षेत्र में काम करने वाली सरकारों को चुन रहे हैं।
संस्कृति एक बुनियादी ढाँचा है, जिसके ज़रिए कोई भी समाज खुद को समझता है और अपने भविष्य की कल्पना करता है। सदियों से, इसका निर्माण पितृसत्ता के पुरुषवादी दृष्टिकोण से हुआ है, यहाँ तक कि उन सभ्यताओं में भी जहाँ महिलाओं की पूजा की जाती थी। आज, मीडिया और साहित्य से लेकर सिनेमा, संगीत, खेल और डिजिटल सामग्री तक, रचनात्मक उद्योगों में महिलाएँ उस पटकथा को नए सिरे से लिख रही हैं और देवी के विचार को दोबारा एक नई परिभाषा दे रही हैं, ताकि उनके प्रति श्रद्धा को घर, अर्थव्यवस्था और सार्वजनिक क्षेत्र में समान अधिकार, समान सम्मान और साझा ज़िम्मेदारी के रूप में दर्शाया जा सके।
परिवर्तन के अगले स्तर का नेतृत्व अब संसदों के साथ-साथ कार्यालयों, बोर्ड रूम, प्रयोगशालाओं और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म से भी होना चाहिए। सरकारी विभागों और राजनीतिक दलों से लेकर विश्वविद्यालयों, अनुसंधान परिषदों, स्टार्टअप्स और बड़े निगमों तक, हर संस्थान को लैंगिक समानता को अपने डीएनए में शामिल करना होगा। इसका अर्थ है कि लैंगिक समानता वाली शिक्षा से लेकर नौकरियों की मूल्य श्रृंखला तक, जहाँ लड़कियाँ कक्षाओं से आगे बढ़कर व्यापक उद्योग 4.0 व्यवस्था तंत्र में विज्ञान, प्रौद्योगिकी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में करियर बना सकें। इसका एक दूसरा अर्थ ये भी है कि कॉर्पोरेट नेता और मुख्य कार्यकारी अधिकारी, भर्ती, प्रतिधारण, दोबारा प्रवेश और पदोन्नति में समानता के लिए प्रतिबद्ध हों और वरिष्ठ प्रबंधन और बोर्ड में और ज्यादा महिलाओं को शामिल करें। इसके लिए एक शोध और नवाचार प्रणाली और एक स्टार्टअप संस्कृति को तैयार करना होगा, जहां महिला संस्थापक, वैज्ञानिक और रचनाकार समान शर्तों पर ऋण, मार्गदर्शन और बाज़ार तक पहुँच सकें।
जी-20 की अध्यक्षता के दौरान, भारत ने महिलाओं के नेतृत्व वाले विकास को एजेंडे के केंद्र में रखा, डिजिटल लैंगिक अंतर को पाटने, महिलाओं की श्रमशक्ति में भागीदारी बढ़ाने और महिला उद्यमिता और नेतृत्व का विस्तार करने की प्रतिबद्धताएँ ज़ाहिर कीं। सशक्त महिलाएँ हमारे युग की महान बदलावकारी शक्ति हैं। अपने परिवारों, समुदायों, देशों और दुनिया को बदलने वाली परिवर्तित महिलाओं के रूप में, वे जनसांख्यिकीय लाभ उठाते हुए महिलाओं और लड़कियों को आज़ादी, विकल्प और सम्मान से जीवन जीने में सक्षम बनाती हैं। भारत अगर इस आंदोलन को इसी रफ्तार से आगे बढ़ाता है, तो एक अग्रणी शक्ति के रूप में इसकी दूसरी पारी की शुरूआत, 2047 तक विकसित भारत की यात्रा से शुरू होगी, वो यात्रा जो नारी शक्ति द्वारा प्रज्वलित और संचालित होगी।

लेखिका लक्ष्मी पुरी संयुक्त राष्ट्र की पूर्व सहायक महासचिव और लैंगिक समानता तथा महिला-नेतृत्व वाले विकास की एक अग्रणी वैश्विक समर्थक हैं। लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके व्यक्तिगत विचार हैं।