BJP OBC मोर्चा छत्तीसगढ़ की नई कार्यकारिणी घोषित, रमेश जायसवाल प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य नियुक्ति

बिलासपुर।  छत्तीसगढ़ प्रदेश ने संगठनात्मक विस्तार करते हुए प्रदेश स्तरीय पदाधिकारियों की घोषणा कर दी है। इस सूची में प्रदेश कार्यसमिति के सदस्य, जिलाध्यक्ष और संभाग प्रभारियों की नियुक्ति की गई है। भाजपा पिछड़ा वर्ग मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष अशोक साहू ने इस संबंध में आधिकारिक आदेश जारी किया है।

जारी आदेश के अनुसार, राजेन्द्र नायक को रायपुर संभाग का प्रभारी नियुक्त किया गया है, जबकि शांतनु साहू को बिलासपुर संभाग की जिम्मेदारी सौंपी गई है। वहीं पूर्व पार्षद रमेश जायसवाल को प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य के रूप में स्थान मिला है।

[pdf_embed url=”https://targetofchhattisgarh.com/wp-content/uploads/2025/12/WhatsApp-Image-2025-12-16-at-7.29.47-PM.pdf”]

घोषित सूची में उपाध्यक्ष, प्रदेश महामंत्री, प्रदेश मंत्री, सोशल मीडिया प्रभारी, प्रदेश कार्यालय प्रभारी सहित अन्य महत्वपूर्ण पदों पर भी नियुक्तियां की गई हैं। संगठन में महिलाओं को भी अहम जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं, जिससे महिला सहभागिता को मजबूती मिलने की बात कही जा रही है।

बेलतरा के पूर्व विधायक रजनीश सिंह बने जिला सहकारी केंद्रीय बैंक, बिलासपुर के अध्यक्ष

बिलासपुर। बेलतरा विधानसभा क्षेत्र के पूर्व विधायक रजनीश सिंह को छत्तीसगढ़ जिला सहकारी केंद्रीय बैंक, बिलासपुर का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। उनकी नियुक्ति की खबर से क्षेत्रवासियों में हर्ष और उत्साह का माहौल है। एव पार्टी कार्यकर्ता और क्षेत्र के लोगों ने उन्हें बधाई दी।

श्री सिंह का राजनीतिक एवं सामाजिक जीवन में लंबा अनुभव रहा है। विधायक रहते हुए उन्होंने क्षेत्र के विकास, किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़े कई मुद्दों पर सक्रिय भूमिका निभाई। अब जिला सहकारी केंद्रीय बैंक की जिम्मेदारी मिलने से किसानों, स्व-सहायता समूहों और ग्रामीण उपभोक्ताओं को बेहतर बैंकिंग सुविधाएं मिलने की संभावना है।

गरीब परिवारों के मकानों को तोडक़र बड़े व्यापारियों के लिए कॉम्प्लेक्स बनाना अन्याय है : कल्याण सिंह

बिलासपुर । नगर निगम के दुर्गा नगर लिंगियाडीह क्षेत्र में 40 वर्षों से निवासरत गरीब परिवारों के मकानों को तोडक़र बड़े व्यापारियों के लिए कॉम्प्लेक्स बनाने के फैसले के खिलाफ अनिश्चितकालीन सांकेतिक धरना आज 22वें दिन भी जारी रहा। स्थानीय पार्षद दिलीप पाटिल के नेतृत्व में आयोजित इस धरने को पूर्व जिला पर्यटन सदस्य एवं कांग्रेस नेता कल्याण सिंह ठाकुर ने खुलकर अपना समर्थन दिया।
ठाकुर ने कहा कि यह निर्णय गरीबों के साथ अन्याय है और नगर निगम को तुरंत कार्रवाई रोकनी चाहिए।

परिवर्तन से गुजरती परंपरा: भारतीय हस्तशिल्प गढ़ रहे हैं आधुनिक डिजाइन की पहचान

परिवर्तन को दर्ज करने वाला क्षण

                                                                                                              श्री पबित्रा मार्गेरिटा
                                                                                              (लेखक कपड़ा और विदेश राज्य मंत्री हैं)

ग्रामीण असम में शिल्पकारों की एक बस्ती की हाल की यात्रा के दौरान एक सामान्य से दृश्य में भारत के हस्तशिल्प तंत्र में आ रहे गहरे बदलाव की झलक दिखाई दी। अनेक शिल्पकार सूखी हुई जलकुंभी को बुन रहे थे। लेकिन ये शिल्पकार वे परंपरागत टोकरियां नहीं बना रहे थे जिन्हें उनका समुदाय सदियों से बुनता आ रहा है। इसके बजाय वे कॉरपोरेट बैठकों के लिए खूबसूरत ऑफिस फोल्डर बना रहे थे। उनके हाथ पीढ़ियों से जारी कला को आगे बढ़ाते हुए चिरपरिचित लय में चल रहे थे। लेकिन उनके उत्पाद और उद्देश्य, दोनों ही पूरी तरह से बदल चुके हैं।
हम 08 से 14 दिसंबर, 2025 तक राष्ट्रीय हस्तशिल्प दिवस मना रहे हैं। ऐसे में, यह दृश्य भारत के हस्तशिल्प परिदृश्य में एक मूक क्रांति का प्रतीक है। हमारी जीवंत हस्तशिल्प परंपराओं में एक महत्वपूर्ण बदलाव आ रहा है। उनका नई जगहों, नए बाजारों और नूतन भविष्य में विस्तार हो रहा है। मूल विशेषताओं की शुद्धता बरकरार रहने के बावजूद माध्यमों और स्वरूपों में जो विकास हो रहा है उसकी कल्पना एक दशक पहले शायद ही की जा सकती थी।
जीवंत ज्ञान प्रणाली के रूप में हस्तशिल्प
इस विकास को समझने के लिए यह स्वीकार करना महत्वपूर्ण है कि भारतीय हस्तशिल्प सिर्फ सुंदरता की वस्तु नहीं रहे हैं। वे सांस्कृतिक पहचान और सामुदायिक परंपराओं में गहराई से रची-बसी जीवंत ज्ञान प्रणालियां हैं। मधुबनी में महिलाएं परंपरागत तौर पर त्यौहारों, शादियों और जीवन संस्कारों के दौरान ताजा लेपी गई दीवारों पर चावल के पेस्ट से पेंटिंग बनाती थीं। इन चित्रों में मछली को जनन क्षमता और मोर को प्रेम का प्रतीक माना जाता था। चित्रण अपने मूल में व्यक्तिगत के बजाय सामूहिक हुआ करता था। गोंड समुदाय के लिए पेंटिंग उसके जीव संबंधी विश्वासों तथा जंगलवासी प्राकृतिक शक्तियों और रक्षा करने वाली आत्माओं से जुड़ी है। उनकी कला सिर्फ सुंदर ही नहीं, बल्कि वाचक परंपरा में जड़ों वाला अनुष्ठानिक ब्रह्मांड विज्ञान भी है।
स्वरूपों को हमेशा उपयोग ने गढ़ा है। असम में जलकुंभी को सुखाने के बाद बुन कर घर में काम आने वाली टोकरियां बनाई जाती हैं। कर्नाटक में लाख के लेप वाले चन्नपटना काष्ठ खिलौने बच्चों के खेलने के काम आते हैं। उन्हें पीढ़ियों से खराद पर बनाया जाता रहा है। माध्यम, स्वरूप और आकृति को एकदूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। वे विशिष्ट अनुष्ठानिक और कार्यात्मक संदर्भों से आबद्ध हैं।
परंपरा का आधुनिक अभिव्यक्ति में विस्तार
आज जो हो रहा है, वह परंपरा से अलग नहीं, बल्कि उसका विस्तार है। मूलभाव, पैटर्न और तकनीकें अभी भी पहचानी जा सकती हैं, लेकिन उनके प्रयोग आश्चर्यजनक रूप से समकालीन हो गए हैं। यह बदलाव केवल एक आयामी नहीं, बल्कि बहु-आयामी है। मधुबनी की मछली, जो कभी एक बड़ी प्रजनन कथा का हिस्सा हुआ करती थी, अब तकिए, टोट बैग और फोन कवर पर दिखाई देती है, जिसे आज के समय के अनुसार इस्तेमाल के लिए नया रूप दिया गया है। गोंड के गहरे रंगों वाले जानवर और पौधे और ज्यामिति डिज़ाइन आज अपने पौराणिक संदर्भ से बाहर भी सराहे जाते हैं।
हालांकि, सबसे बड़ा परिवर्तन माध्यम में आया है। जलकुंभी आज कॉर्पोरेट फ़ोल्डर और डिज़ाइनर हैंडबैग का रूप ले रही है। मधुबनी कला मिट्टी की दीवारों से हटकर लकड़ी के फर्नीचर, वस्त्रों और चमड़े के सहायक उपकरणों पर की जाने लगी है। चन्नपटना शिल्प, जो कभी केवल खिलौनों में ही दिखता था, अब सजावटी नक्शों, झूमरों, गृह सज्जा और डिज़ाइनर फ़र्नीचर में दिखाई देता है। पारंपरिक लाख का अभी भी इस्तेमाल हो रहा है लेकिन उसका रूप पूरी तरह आधुनिक हो गया है। यह बदलाव आज के अनुकूल है, न कि उसका कमजोर पड़ना।
भारतीय शिल्प पर आधारित फैशन की वैश्विक स्तर पर एक प्रमुख पहचान बन गयी है, जिसमें पारंपरिक कढ़ाई को ‘पेरिस हौते कॉउचर वीक’ में प्रदर्शित किया गया था। नेशनल गैलरी ऑफ विक्टोरिया जैसे संग्रहालयों में अब “ट्रांसफ़ॉर्मिंग वर्ल्ड्स” जैसी प्रदर्शनियाँ गोंड और मधुबनी कला और उनके आधुनिक रूपों को उनकी संस्कृति या समाज के संदर्भों के बजाय समकालीन कला के तौर पर चित्रित कर रही हैं।
नेतृत्व और सरकारी हस्तक्षेप परिवर्तन को गति दे रहे हैं
इस परिवर्तन को राष्ट्रीय नेतृत्व और रणनीतिक सरकारी हस्तक्षेपों से महत्वपूर्ण समर्थन मिला है। माननीय प्रधानमंत्री के नेतृत्व ने इस आंदोलन को असाधारण गति दी है। उनका ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘लोकल टू ग्लोबल’ का बार-बार किया गया आह्वान कारीगरों के प्रति उनके गहरे लगाव को दर्शाता है। वह हमेशा नागरिकों से स्थानीय उत्पाद खरीदने का आग्रह करते हैं, जैसा कि उन्होंने स्वयं कहा है कि: “जब हम ऐसा करते हैं, तो हम केवल सामान नहीं खरीदते हैं; हम एक परिवार के लिए आशा लाते हैं, एक कारीगर की कड़ी मेहनत का सम्मान करते हैं, और एक युवा उद्यमी के सपनों को पंख देते हैं।” उन्होंने अपने नवीनतम “मन की बात” संबोधन में बताया कि वह विश्व के नेताओं के साथ मुलाकातों के दौरान जानबूझकर हाथ से बने भारतीय उत्पादों को ही उपहार के रूप में क्यों देते हैं। ऐसा करके वह यह सुनिश्चित करते हैं कि वह जहाँ भी जाएँ उनके साथ साथ भारत की समृद्ध शिल्प विरासत भी जाये। उन्होंने कहा की कि यह केवल प्रतीकात्मक नहीं है, बल्कि यह उनकी ओर से भारत की कलात्मक विरासत को प्रदर्शित करने का एक तरीका है ताकि हमारे कारीगरों की प्रतिभा को दुनिया भर के सामने लाया जा सके।
विभिन्न सरकारी पहलें इस परिवर्तन को गति दे रही हैं। वस्त्र मंत्रालय, विकास आयुक्त (हस्तशिल्प) के माध्यम से, राष्ट्रीय हस्तशिल्प विकास कार्यक्रम के तहत कारीगरों को कौशल विकास, क्लस्टर-आधारित प्रशिक्षण कार्यक्रम, विपणन सहायता, अवसंरचना और प्रौद्योगिकी सहायता और ऋण उपलब्ध कराकर सीधे सहायता प्रदान कर रहा है। राष्ट्रीय फैशन प्रौद्योगिकी संस्थान(निफ्ट) ने भारत भर में अपने 19 परिसरों के माध्यम से, शिल्पकारों और समकालीन डिजाइनरों के बीच सेतु का निर्माण किया है ताकि आधुनिक डिजाइनों में हमारी परम्परा की झलक भी मिल सके। भौगोलिक संकेत रजिस्ट्री ने 366 से अधिक हस्तशिल्पों को संरक्षित किया है। इससे सामुदायिक प्रतिभा की सुरक्षा सुनिश्चित होती है और उन्हें सही में मान्यता मिलती है।
मैं असम राज्य से हूँ, वहां के कई पारंपरिक हस्तशिल्पों जैसे कि सर्थेबारी मेटल क्राफ्ट, माजुली मास्क, बिहू ढोल, जापी, पानी मेतेका, आशारिकांदी टेराकोटा और बोडो समुदाय के कई अन्य हस्तशिल्पों को हाल ही में भौगोलिक संकेत (जीआई टैग) पंजीकरणों की मान्यता मिली है जो कि बहुत लंबे समय से अपेक्षित थी। प्रत्येक पंजीकरण यह दर्शाता है कि कैसे असम या पूरे भारत के हर कोने में विविधता की झलक मिलती है जो दशकों तक उपेक्षित रहने के बाद, आज राष्ट्रीय मंच पर एक नया स्थान पा रही है।
विकसित भारत के लिए एक गतिशील और विकसित होती विरासत
भारत के हस्तशिल्प विकास में सबसे बड़ा सबक यह है कि परंपरा स्थिर नहीं है बल्कि यह अनुकूलित होती है, अवशोषित होती है और आगे बढ़ती है। जलकुंभी की घरेलू टोकरियों से लेकर अन्य वैश्विक सामानों तक की यात्रा हमारे कारीगर समुदायों के व्यवहारिकता और रचनात्मकता का प्रतीक है। जैसे-जैसे भारत 2047 तक विकसित भारत के अपने दृष्टिकोण को साकार करने की ओर बढ़ रहा है, वैसे ही हस्तशिल्प क्षेत्र विरासत और नवोन्मेष, ग्रामीण आजीविका और वैश्विक आकांक्षा, पहचान और आधुनिकता के एक शक्तिशाली चौराहे पर खड़ा है।
यह आंदोलन जैसे-जैसे मज़बूत होता जा रहा है, हम सबकी भी ज़िम्मेदारी बनती है कि हर कारीगर को सशक्त बनाया जाए और हमारी प्रत्येक परंपरा फलती-फूलती रहे। भारत की हस्तशिल्प विरासत सिर्फ़ एक याद बनकर नहीं रहनी चाहिए, बल्कि हमारी पहचान एक जीवित अभिव्यक्ति के रूप में फलनी-फूलनी चाहिए। हर बार जब कोई परिवार स्थानीय चीज़ें चुनता है या हर बार जब कोई डिज़ाइनर किसी हस्तशिल्प समूह के साथ भागीदारी करता है, तो वह आत्मनिर्भर भारत की भावना को ही आगे बढ़ाता है। ये वही सधे हुए सृजनशील और सदियों की समझदारी से संजोये हुए हाथ है जो भारत की आने वाली पीढ़ियों का मार्ग दर्शन करेंगे।

बढ़े समर्थन मूल्य और सुविधाजनक खरीदी व्यवस्था ने किसानों की आय में बढ़ोतरी का दिया विश्वास

कोरबा  । मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार किसानों की आय दोगुनी करने की दिशा में निरंतर कार्य कर रही है। सर्वाधिक समर्थन मूल्य, माइक्रो एटीएम, त्वरित भुगतान प्रणाली, ऑनलाइन टोकन, उपार्जन केंद्रों में सुव्यवस्थित व्यवस्था और बेहतर सुविधा की मजबूती जैसे प्रयासों ने किसानों के मन में सरकार के प्रति विश्वास को और सुदृढ़ किया है। सरकार का लक्ष्य है कि हर किसान बिना किसी कठिनाई के अपनी उपज बेच सके तथा उसे मेहनत का पूरा और पारदर्शी मूल्य मिल सके।

गाँव तालापार के किसान श्री बसंत सोनी उन अनेक किसानों में से एक हैं, जिन्होंने छत्तीसगढ़ सरकार की पारदर्शी और सुविधाजनक धान खरीदी व्यवस्था का लाभ उठाते हुए अपनी मेहनत की उपज को सम्मानजनक मूल्य पर बेचा है। 45 डिसमिल भूमि में खेती करने वाले श्री सोनी इस वर्ष कुल 8 क्विंटल 80 किलोग्राम धान लेकर बक्साही उपार्जन केंद्र पहुँचे।

श्री सोनी बताते हैं कि पिछले वर्ष भी उन्होंने लगभग इतनी ही उपज विक्रय की थी, उनका कहना है कि 3100 रुपये प्रति क्विंटल की दर से उन्हें अपनी उपज का उचित मूल्य मिला जिससे उनके परिवार की आर्थिक स्थिति और बेहतर होगी, वे कहते हैं छत्तीसगढ़ सरकार ने किसानों के लिए जो व्यवस्थाएँ की हैं, वे वास्तव में सराहनीय हैं। उपार्जन केंद्र में किसी भी प्रकार की परेशानी नहीं होती। तौल समय पर हो जाती है और भुगतान भी जल्दी मिल जाता है। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने जो मूल्य बढ़ाया है, वह हम किसानों के लिए बड़ी राहत है। प्रक्रिया के दौरान उन्हें केंद्र में सुचारू तौल सुविधा, माप-तौल में शुद्धता, प्रतीक्षा के दौरान पेयजल एवं बैठने की व्यवस्था तथा टोकन प्रणाली के माध्यम से भीड़ रहित संचालन जैसी व्यवस्थाएँ मिलीं। इन सब सुविधाओं ने उपज विक्रय को सरल और पारदर्शी बना दिया।

उन्होंने आगे बताया कि इस बार की बेहतर कीमत से उनकी खेती में निवेश बढ़ेगा। वे आने वाले मौसम में अधिक उत्पादन हेतु आधुनिक कृषि तकनीक और गुणवत्तापूर्ण बीजों का उपयोग करने की योजना बना रहे हैं। इससे न केवल उनकी आय में वृद्धि होगी, बल्कि कृषि उत्पादकता भी मजबूत होगी।

जनदर्शन में कलेक्टर-सीईओ ने सुनी लोगों की समस्याएं

गौरेला पेंड्रा मरवाही । कलेक्ट्रेट के अरपा सभा कक्ष में आयोजित साप्ताहिक जनदर्शन में कलेक्टर श्रीमती लीना कमलेश मंडावी और जिला पंचायत सीईओ श्री मुकेश रावटे ने लोगों की समस्याएं सुनी। उन्होंने प्रत्येक आवेदकों से उनकी समस्याएं सुनी और उनके आवेदनों का अवलोकन किया तथा संबंधित विभाग के अधिकारियों को जनदर्शन में प्राप्त आवेदनों को प्राथमिकता में लेकर निराकरण के निर्देश दिए। उन्होंने शिकायतों की जांच पड़ताल कर नियमानुसार कार्रवाई करने और मांगों का परीक्षण कर पात्रतानुसार लाभ दिलाने कहा। साथ ही आवेदनों पर की गई कार्रवाई से आवेदकों को सूचित करने भी कहा। जनदर्शन में विभिन्न मांगों, समस्याओं एवं शिकायतों से संबंधित 43 आवेदन प्राप्त हुए। इनमें मुख्यतः भूमि का भौतिक सत्यापन एवं रकबा बढ़ाने, बकाया भुगतान, छात्रवृत्ति, आवास किश्त, गिरदावरी में सुधार करने, रकबा संशोधन, सीमांकन, मानदेय बढ़ाने, अनियमितता की जांच, बिजली मीटर बदलने, मुआवजा, मजदूरी भुगतान आदि से संबंधित आवेदन शामिल हैं।

टीएल बैठक : प्रगतिरत पीएम आवासों को 31 मार्च तक पूर्ण करने कलेक्टर ने दिए निर्देश 

गौरेला पेंड्रा मरवाही,। साप्ताहिक समय-सीमा की बैठक में कलेक्टर श्रीमती लीना कमलेश मंडावी ने पीएम जनमन के तहत स्वीकृत आवासों सहित प्रधानमंत्री आवास योजना की समीक्षा के दौरान डोर लेवल, छत लेवल एवं लेंटर हो चुके प्रगतिरत आवासों को 31 मार्च 2026 तक अनिवार्य रूप से पूर्ण करने के निर्देश दिए। उन्होंने जो आवास पूर्ण हो गए हैं, उनके अंतिम किश्त की पूरी राशि जारी करने और अप्रारंभ आवासों को शीघ्र प्रारंभ कराने कहा। उन्होंने पीएम जनमन योजना के क्रियान्वयन की समीक्षा के लिए नियुक्त नोडल अधिकारियों से आवास की प्रगति की पंचायतवार जानकारी ली तथा सभी विभागों की हितग्राहीमूलक योजनाओं से शत प्रतिशत हितग्राहियों को लाभान्वित करने निर्देश दिए।

कलेक्टर ने विभिन्न विभागों के अधिकारियों द्वारा पिछले सप्ताह स्कूलों एवं आंगनबाड़ी केंद्रों का किए गए निरीक्षण के तहत विद्यार्थियों एवं शिक्षकों की उपस्थिति, पढ़ाई का स्तर, मध्यान्ह भोजन की गुणवत्ता, शाला परिसर में साफ-सफाई, पेयजल, शौचालय, बिजली सुविधा आदि की जानकारी ली। उन्होंने जिला शिक्षा अधिकारी एवं सभी खण्ड शिक्षा अधिकारियों को हर सप्ताह 10 से 12 स्कूलों का निरीक्षण करने और कमियों में सुधार लाने कहा। साथ ही यह भी सुनिश्चित करने कहा कि शिक्षक समय का पाबंद रहें और समर्पित होकर बच्चों को पढ़ाएं।

कलेक्टर ने शाला परिसर में स्थित जीर्ण हो चुके अनुपयोगी भवन जो डिसमेंटल के लिए घोषित हो चुके हैं, को शीतकालीन अवकाश में डिसमेंटल कराने तथा जहां कहीं स्कूल भवनों के उपर से बिजली का तार गुजरा है, उसे अन्यत्र शिफ्ट कराने कहा। कलेक्टर ने विभागीय योजनाओं के क्रियान्वयन में प्रगति लाने और जनसमस्याओं एवं जनशिकायतों के लंबित प्रकरणों को शीघ्रता से निराकृत करने अधिकारियों को निर्देश दिए। बैठक में जिला पंचायत सीईओ मुकेश रावटे, प्रभारी अपर कलेक्टर अमित बेक, संयुक्त कलेक्टर दिलेराम डाहिरे, एसडीएम मरवाही देवेन्द्र सिरमौर, एसडीएम पेण्ड्रारोड विक्रांत अंचल सहित सभी विभागों के अधिकारी उपस्थित थे।

समर्थन मूल्य पर जिले में अब तक 2.65 लाख क्विंटल धान उपार्जित

गौरेला पेंड्रा मरवाही । समर्थन मूल्य पर किसानों से जिले में अब तक कुल 2 लाख 64 हजार 991.20 क्विंटल धान का उपार्जन किया जा चुका है। इनमें मोटा धान 2 लाख, 61 हजार 758 क्विंटल और पतला धान 3 हजार 233.20 क्विंटल शामिल है। प्राप्त जानकारी के अनुसार अब तक धान खरीदी केंद्र मेढ़ुका में 23 हजार 454 क्विंटल, लरकेनी में 22 हजार 864.80 क्विंटल, धनौली में 20 हजार 948.40 क्विंटल, सिवनी में 19 हजार 703.60 क्विंटल, लालपुर में 19 हजार 569.60 क्विंटल, पेण्ड्रा में 17 हजार 200.40 क्विंटल, भर्रीडांड़ में 16 हजार 918 क्विंटल, नवागांव पेण्ड्रा में 14 हजार 508.40 क्विंटल, निमधा में 13 हजार 414.40 क्विंटल, खोडरी में 12 हजार 522.40 क्विंटल, देवरीकला में 13 हजार 027.20 क्विंटल, गौरेला में 11 हजार 369.60 क्विंटल, मरवाही में 10 हजार 782 क्विंटल, परासी में 11 हजार 280.40 क्विंटल, तरईगांव में 11 हजार 289.20 क्विंटल, तेंदुमुड़ा में 9 हजार 182.40 क्विंटल, बंशीताल में 7 हजार 952.80 क्विंटल, कोडगार में 4 हजार 724 क्विंटल, जोगीसार में 2 हजार 356.80 क्विंटल और धान खरीदी केंद्र बस्ती में 1 हजार 922.80 क्विंटल धान खरीदा गया है।

चुनाव सुधार

स्वपन दासगुप्ता

पचास साल से भी अधिक समय पहले, भारतीय राजनीति के एक प्रतिष्ठित ब्रिटिश विद्वान ने व्यंग्यपूर्वक टिप्पणी की थी कि चुनाव उन चीज़ों में से एक हैं “जिन्हें भारतीय बहुत अच्छे से संपन्न करते हैं।” भारतीय लोकतंत्र के स्थायी रूप से स्थगित हो जाने या ‘निर्देशित’ हो जाने की आशंका (जो पूरी तरह से गलत नहीं थी) की पृष्ठभूमि में, चुनावी प्रक्रिया की पवित्रता को सार्वजनिक जीवन की एक उद्धारक विशेषता के रूप में देखा जाता था। लोकतंत्र के इस प्राथमिक स्तंभ की अंतिम पुष्टि 1977 में तब हुई, जब आपातकाल की छाया के बावजूद, भारत के मतदाताओं ने एक अधिनायकवादी शासन को वोट के जरिये सत्ता से बाहर कर दिय।

चुनाव आयोग (ईसीआई) की यह सुनिश्चित करने की क्षमता कि जनमानस की इच्छा विधायिकाओं में परिलक्षित हो, स्वतंत्रता प्राप्ति के पिछले सात दशकों में बार-बार परखी गई है। हालाँकि, मार्ग से विचलित होने के उदाहरण मौजूद हैं—इनमें 1972 का पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव और 1987 का जम्मू-कश्मीर चुनाव, दो उल्लेखनीय उदाहरण हैं— लेकिन, भारत का चुनावी अनुभव आमतौर पर राजनीतिक प्रणाली की वैधता बनाए रखने में सहायक रहा है।
जैसा कि सर्वाधिक मत से जीत की प्रणाली (फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट) में होता है, जो विधायी बहुमत को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाती है, ऐसे उदाहरण भी हैं, जब हारने वाले लोग हैरानी में रह गए जिनके चुनावी अभियान के अनुभव परिणाम से मेल नहीं खाते थे। 1971 में, एक पराजित पक्ष ने जोर देकर कहा कि सोवियत-निर्मित ‘अदृश्य स्याही’ के उपयोग ने इंदिरा गांधी को शानदार जीत हासिल करने में मदद की। उपग्रह द्वारा ईवीएम के हेरफेर के ऐसे ही अविश्वसनीय दावे 2009 के आम चुनाव के बाद भी सुने गए थे।
जो कभी साजिश सिद्धांतकारों का विशेषाधिकार हुआ करता था, वह पिछले वर्ष अब हाशिए का मुद्दा नहीं रहा है। अपनी पार्टी के संख्या-विश्लेषकों से प्रोत्साहित होकर, जिनकी भविष्यवाणियाँ परिणाम से भिन्न थीं, विपक्ष के नेता ने मतदाता सूचियों की सत्यता को चुनौती दी है। जोरदार दावे किए गए हैं कि चुनाव आयोग विशेष गहन पुनरीक्षण का उपयोग कर अल्पसंख्यक मतदाताओं को इस आधार पर बाहर करने पर विचार कर रहा है कि वे भारतीय नहीं भी हो सकते हैं। यह विवाद पश्चिम बंगाल के राजनीतिक दलों के बीच खींचतान का विषय बन चुका है और यह असम तथा अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में भी फैल सकता है।
चूंकि संविधान का अनुच्छेद 321 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम चुनाव आयोग को चुनाव के संचालन के संबंध में ‘विशेष क्षेत्राधिकार’ देता है, इसलिए चुनावी प्रक्रिया को राजनीतिक हस्तक्षेप से दूर रखा गया है। दशकों से चुनाव आयोग ने चुनावों की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए कई नवाचार पेश किए हैं। सबसे महत्वपूर्ण उपायों में आदर्श आचार संहिता शामिल है, जो अप्रिय राजनीतिक व्यवहार पर अंकुश लगाती है और ईवीएम ने वोटों में हेरफेर को और अधिक कठिन बना दिया है, हालांकि यह असंभव नहीं है। अब मतदान केंद्रों पर पुलिस और अर्धसैनिक बलों की तैनाती के लिए नियम मौजूद हैं। इसके अतिरिक्त, प्रौद्योगिकी के प्रसार के साथ, चुनाव आयोग मतदान केंद्रों में सीसीटीवी कैमरों पर जोर दे रहा है, ताकि मर्यादा बनी रहे तथा मतदान अधिकारियों और मतदाताओं को डराया-धमकाया न जा सके।
निश्चित रूप से, यह सच है कि इन नवाचारों में से कोई भी पूरी तरह से दोषरहित नहीं है। मतगणना केंद्रों सहित स्थानीय स्तर पर अक्सर बाहुबल का प्रभाव रहता है और इसके संभावित रूप से विकृत परिणाम हो सकते हैं। मतदान अधिकारियों द्वारा हेरफेर के अनुभवजन्य प्रमाणों को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। जब संसद में शीतकालीन सत्र के दौरान चुनाव सुधारों पर चर्चा होगी, तो संभव है कि देश को आदर्श लोकतांत्रिक आचरण के अन्य विचलनों के बारे में सुनने को मिले, जिनका चुनाव आयोग द्वारा समाधान किये जाने की आवश्यकता है।
लोकतांत्रिक परियोजना में एक महत्वपूर्ण हितधारक के रूप में, संसद को आम जनता के लिए अपने व्यापक चुनाव अनुभव को संकलित करने की आवश्यकता है। हालांकि, अच्छी राजनीति के बड़े लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होगी यदि राजनीतिक कार्यपालिका चुनाव आयोग के खिलाफ आम धमकियों, जिसमें शारीरिक नुकसान भी शामिल है, का इशारा करती है और सरकारी अधिकारियों—जिनके शालीन आचरण पर पूरी प्रणाली निर्भर करती है—को अपने संवैधानिक कर्तव्यों का पालन करने से रोकती है। पश्चिम बंगाल में चल रहे एसआईआर के दौरान सत्तारूढ़ दल का आचरण शर्मनाक है।
कहने की जरूरत नहीं है कि सटीक मतदाता सूची का अस्तित्व लोकतंत्र की मूल शर्त है। यदि वंचित समुदायों के सदस्य मतदान केंद्रों से दूर रहने के लिए मजबूर किए जाते हैं, तो इसका विरोध होना स्वाभाविक है। दुर्भाग्यवश, इस बात का विरोध काफी कम होता है, जब बड़ी संख्या में लोगों को मतदाता सूची में शामिल नहीं किया जाता है या दोहरी और तिहरी प्रविष्टियाँ होती हैं, जो परिणाम को प्रभावित कर सकती है। चुनाव आयोग ने मतदाता पहचान पत्र और तस्वीरों के माध्यम से धोखाधड़ी की समस्या को सुलझाने की कोशिश की है। हालांकि, धोखेबाजों ने मृत या स्थायी रूप से स्थानांतरित लोगों के नाम पर वोट देकर चुनाव प्रणाली को चकमा देने के तरीके भी निकाल लिए हैं। पूर्वी भारत में अतिरिक्त समस्या यह है कि मतदाता सूचियों में उन व्यक्तियों को जोड़ दिया गया है, जो भारतीय चुनावों में वोट देने के लिए अयोग्य हैं।
वर्तमान में जारी एसआईआर प्रक्रिया पहला अवसर नहीं है, जब चुनाव आयोग एक व्यापक मतदाता सूची तैयार कर रहा है। हालांकि इस बड़े पैमाने के कार्यक्रम के लिए कोई निश्चित समय सारिणी, जैसे हर 10 साल में एक बार या ऐसी कोई अन्य अवधि, निर्धारित नहीं है, लेकिन यह माना जाता है कि जब तक यह आवधिक पुनरीक्षण नहीं किया जाएगा, चुनाव परिणाम जनभावना को सही ढंग से प्रतिबिंबित नहीं करेंगे।
20वीं सदी के शुरुआती दशकों में आयरलैंड के संदर्भ में कहा जाता था कि लोगों को ‘जल्द वोट दें और अक्सर वोट दें’ की सलाह दी जाती थी। एक उत्साही शोधकर्ता के लिए यह दस्तावेज बनाने लायक हो सकता है कि भारत के कुछ हिस्सों में किस प्रकार की अभिनव प्रथाएँ प्रचलित हैं, जैसे मृत व्यक्तियों द्वारा मतदान या एक उम्मीदवार के मतों का उसके प्रतिद्वंद्वी के खाते में सहजता से स्थानांतरित हो जाना। एसआईआर रचनात्मक राजनीति के इन सभी उदाहरणों को इतिहास में नहीं बदल देगा, लेकिन यह वैश्विक भरोसे में थोड़ी और दृढ़ता जोड़ेगा कि भारत अपनी चुनाव प्रक्रियाओं को अच्छे से संचालित करता है। आशा यह है कि आने वाले दशकों में किसी भी राज्य या क्षेत्र के बारे में यह नहीं कहा जाएगा कि वहाँ चुनाव नहीं होते, बल्कि उन्हें ‘प्रबंधित’ किया जाता है।

केंद्रीय राज्यमंत्री तोखन ने एकता नगर में आयोजित Sardar@150 यूनिटी मार्च – राष्ट्रीय पदयात्रा के समापन समारोह में की सहभागिता

दिल्ली । केंद्रीय आवासन एवं शहरी कार्य राज्य मंत्री सह बिलासपुर लोकसभा सांसद तोखन साहू आज एकता नगर में आयोजित Sardar@150 यूनिटी मार्च – राष्ट्रीय पदयात्रा के भव्य समापन समारोह में सहभागिता हेतु माननीय उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन के साथ दिल्ली से गुजरात पहुंचे तथा कार्यक्रम उपरांत उपराष्ट्रपति महोदय के साथ ही वापस लौटे।

यह राष्ट्रीय समारोह लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की 150वीं जयंती वर्ष पर आयोजित पदयात्रा के ऐतिहासिक समापन का अवसर था। कार्यक्रम में सरदार पटेल द्वारा 560 से अधिक रियासतों के एकीकरण के माध्यम से अखंड भारत की मजबूत नींव रखने के अतुलनीय योगदान को स्मरण किया गया।

समारोह के दौरान यह भी रेखांकित किया गया कि सरदार पटेल का एकता, राष्ट्रनिर्माण, आत्मविश्वास और सशक्त भारत का स्वप्न आज प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में नई ऊर्जा और संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है।
प्रधानमंत्री जी के आत्मनिर्भर भारत अभियान, विकसित भारत @2047 तथा युवा-शक्ति के सशक्तिकरण पर केंद्रित विज़न ने सरदार साहब के विचारों को आधुनिक भारत में गति प्रदान की है।

कार्यक्रम में इस बात पर भी जोर दिया गया कि सरदार पटेल की विचारधारा से प्रेरित होकर देश का युवा आत्मनिर्भर, नवाचार-आधारित तथा विकसित भारत के निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

इस अवसर पर माननीय उपराष्ट्रपति श्री सी. पी. राधाकृष्णन, गुजरात के राज्यपाल श्री आचार्य देवव्रत, गुजरात के मुख्यमंत्री श्री भूपेंद्र पटेल, केंद्रीय मंत्री श्री राजीव रंजन सिंह, केंद्रीय मंत्री डॉ. मनसुख मांडविया, केंद्रीय राज्य मंत्री श्रीमती राक्षा खड़से सहित अनेक विशिष्ट अतिथि उपस्थित रहे।