एशियाई खेल 2026: खिलाड़ियों की भागीदारी के लिए नए चयन मानदंड जारी

नई दिल्ली। युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय ने एशियाई खेल 2026(asian-games) और अन्य बहु-खेल आयोजनों में खिलाड़ियों और टीमों की भागीदारी के लिए चयन मानदंड जारी किए हैं। इसका उद्देश्य एक पारदर्शी और न्यायसंगत ढांचा तैयार कर यह सुनिश्चित करना है कि केवल उन एथलीटों को ही बहु-विषयक खेल आयोजनों में भागीदारी के लिए विचार किया जाए जिनके पास पदक जीतने का वास्तविक मौका है।

चयन मानदंडों में मापनीय और गैर-मापनीय दोनों प्रकार की प्रतियोगिताओं के लिए मानक निर्धारित किए गए हैं जो एशियाई खेलों, पैरा एशियाई खेलों, राष्ट्रमंडल खेलों, एशियाई इनडोर खेलों, एशियाई समुद्र तट खेलों, युवा ओलंपिक, एशियाई युवा खेलों, राष्ट्रमंडल युवा खेलों जैसे बहु-खेल प्रतियोगिताओं में भागीदारी के बारे में निर्णय लेने के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत होंगे। हालांकि ओलंपिक और ऐसी अन्य अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताएं इसके दायरें में नहीं आएंगे जहां एथलीट या टीम की भागीदारी, संबंधित अंतरराष्ट्रीय महासंघों द्वारा निर्धारित योग्यता मानकों द्वारा निर्धारित की जाती है।

मापनीय व्यक्तिगत खेल और स्पर्धाओं के लिए, कोई भी खिलाड़ी भारतीय दल में तभी जगह पा सकेगा जब उसने आगामी एशियाई खेलों से पहले 12 महीनों के भीतर आयोजित किसी अंतरराष्ट्रीय खेल महासंघ द्वारा मान्यता प्राप्त प्रतियोगिता में पिछले एशियाई खेलों के छठे स्थान के प्रदर्शन की बराबरी की हो या उससे बेहतर प्रदर्शन किया हो। यदि वह खेल या स्पर्धा पिछले एशियाई खेलों में शामिल नहीं थी, तो चयन मानदंड आगामी एशियाई खेलों से पहले 12 महीनों के भीतर उस खेल या स्पर्धा के लिए आयोजित सीनियर एशियाई चैंपियनशिप के समान मानदंडों के आधार पर होंगे।

गैर-मापनीय व्यक्तिगत खेल और स्पर्धाओं के लिए, जहां आगामी एशियाई खेलों से पूर्व 12 महीनों के भीतर सीनियर एशियाई चैम्पियनशिप आयोजित की गई हो या विश्व रैंकिंग नियमित रूप से जारी की जाती हो, ऐसे खिलाड़ी को दल में शामिल करने पर विचार किया जाएगा जिसने पिछले 12 महीनों के भीतर आयोजित अंतिम सीनियर एशियाई चैम्पियनशिप में अपने भार या स्पर्धा में छठा या उससे बेहतर स्थान प्राप्त किया हो या उसकी विश्व रैंकिंग अंतर्राष्ट्रीय रैंकिंग में एशियाई देशों में शीर्ष 6 में शामिल हो।

यदि आगामी एशियाई खेलों से पहले पिछले 12 महीनों में कोई सीनियर एशियाई चैंपियनशिप आयोजित नहीं की गई है और कोई अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग नियमित रूप से प्रकाशित नहीं की गई हो तो उस स्थिति में एथलीट को समकक्ष अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में एशियाई देशों के बीच शीर्ष 6 में स्थान प्राप्त करना होगा।

टीम खेलों (जैसे फुटबॉल, हॉकी आदि) और टीम स्पर्धाओं (जैसे रिले, युगल, मिश्रित युगल आदि) के लिए, 12 महीनों के भीतर आयोजित अंतिम सीनियर एशियाई चैंपियनशिप में शीर्ष 8 में स्थान प्राप्त करने वाली टीम या अंतर्राष्ट्रीय रैंकिंग में एशियाई देशों में शीर्ष 8 में स्थान प्राप्त करने वाली टीम को एशियाई खेलों में भाग लेने के लिए विचार किया जाएगा।

अगर अंतर्राष्ट्रीय रैंकिंग प्रकाशित नहीं की गई है या आगामी एशियाई खेलों से पहले 12 महीनों के भीतर सीनियर एशियाई चैम्पियनशिप आयोजित नहीं की गई है, तो उस स्थिति में टीम को समकक्ष अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता में एशियाई देशों के बीच शीर्ष 8 में स्थान प्राप्त करना होगा।

इस मानदंड में छूट का एक प्रावधान है जो मंत्रालय को यह अधिकृत करता है कि यदि विशिष्ट खेल अथवा भारतीय खेल प्राधिकरण (एसएआई) के विशेषज्ञों की राय के आधार पर उचित कारणों से निर्धारित मानदंडों में छूट में व्यक्तियों और टीमों की भागीदारी की सिफारिश की जाती है तो वह उचित निर्णय ले सकता है।

इसमें प्रावधान है कि यदि राष्ट्रीय खेल महासंघों का उद्देश्य केवल भागीदारी हो तथा उत्कृष्टता प्राप्त करना न हो तो मंत्रालय उनके द्वारा अनुशंसित नामों को मंजूरी नहीं दे सकता।

इसके अलावा, यदि विशिष्ट खेल विधाओं के विशेषज्ञ और भारतीय खेल प्राधिकरण को लगता है कि किसी खेल के लिए एशियाई चैंपियनशिप नियमों को दरकिनार करने और खिलाड़ियों को पात्रता मानदंडों को पूरा करने में मदद करने के लिए अनियमित अंतराल पर आयोजित की जा रही है, तो मंत्रालय भागीदारी को मंजूरी नहीं दे सकता है, खासकर यदि प्रतियोगिता का स्तर कम है या यदि आगामी एशियाई खेलों में भाग लेने वाले शीर्ष राष्ट्र उक्त प्रतियोगिता में अनुपस्थित हैं।

चयन मानदंडों में आगे यह प्रावधान है कि केवल वे खिलाड़ी, कोच और सहायक कर्मचारी ही भारतीय दल का हिस्सा होंगे, जिन्हें सरकार की लागत पर मंजूरी दी गई है। इनके अलावा कोई भी अतिरिक्त खिलाड़ी, कोच और सहायक कर्मचारी शामिल नहीं किए जाएंगे, भले ही इसमें सरकार का कुछ भी खर्च न हो।

चयन मानदंडों के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं:

https://yas.gov.in/sites/default/files/Letter%2024.09.2025%20Selection%20Criteria%20for%20Participa

एनटीपीसी करेगा सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल को 5.58 करोड़ की मदद

  • उच्च स्तरीय ब्लड बैंक एवं पैथोलॉजी लैब की होगी स्थापना

  • एनटीपीसी एवं अस्पताल प्रबंधन के बीच हुआ अनुबंध

बिलासपुर। कार्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) के तहत नवनिर्मित कुमार साहब स्व. दिलीप सिंह जुदेव शासकीय सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, बिलासपुर में ब्लड बैंक एवं लैब को अत्याधुनिक एवं विश्वस्तरीय बनाने के लिये लगभग रूपये 5.58 करोड़ का उपकरण क्रय कर उनके द्वारा प्रदाय किये जाने हेतु मेमोरेण्डम ऑफ एसोसिएशन (एम.ओ.ए.) में डॉ0 भवनीश सामान सी.एम.ओ एन.टी.पी.सी. एवं डॉ. बी.पी. सिंह चिकित्सा अधीक्षक के द्वारा विजय कृष्ण पाण्डेय, एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर, एन.टी.पी.सी., सीपत एवं संजय कुमार अग्रवाल, कलेक्टर बिलासपुर के समक्ष अनुबंध पर हस्ताक्षर किये गये।

एन.टी.पी.सी. के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर विजय कृष्ण पाण्डेय एवं उनकी टीम द्वारा अस्पताल का निरीक्षण किया गया। उनके द्वारा सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल का निर्माण, वार्ड, लैब एवं चिकित्सकीय व्यवस्था की प्रशंसा की गयी। उनके द्वारा बताया गया कि यह छत्तीसगढ़ का प्रथम विश्वस्तरीय सुविधापूर्ण चिकित्सालय है एवं यह हॉस्पिटल इस प्रदेश की जनता के लिये बहुत लाभदायी होगा। भविष्य में भी वे सी.एस.आर. के तहत या अन्य किसी भी तरह से इस सुपर स्पेशियलिटी चिकित्सालय के लाभ व सुविधा के लिये सहयोग प्रदान करते रहेंगे। कलेक्टर संजय अग्रवाल मरीजों को समुचित विश्वस्तरीय सुविधा प्रदान करने शीघ्र ही सभी कार्य पूर्ण संपादित किये जाने हेतु आश्वस्त किया। इस अवसर पर एन.टी.पी.सी. के जय प्रकाश सत्यम, असिस्टेंट जी.एम. (एच.आर.), मोहन लाल, सी.एस.आर. हेड, ज्योत्सना कुशवाहा, हेड लीगल सेल, श्वेता जी, डी.जी.एम. एवं छत्रपाल पटेल, चीफ फार्मासिस्ट, एन.टी.पी.सी. एवं सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, बिलासपुर के ध्रुव पाण्डेय, भूपेन्द्र कौशिक, श्रीमती आराधना दास, श्रीमती विनिता पटले एवं प्रभात शुक्ला उपस्थित थे।

गतौरी में RSS शताब्दी समारोह की तैयारी को लेकर कार्यकर्ताओं की बैठक

बिलासपुर । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की स्थापना के 100 वर्ष पूर्ण होने पर मनाए जाने वाले शताब्दी समारोह की तैयारी को लेकर बिलासपुर जिले के ग्राम गतौरी में संघ कार्यकर्ताओं की ग्रामीण स्तर पर  बैठक आयोजित हुई। बैठक में कार्यक्रम की रूपरेखा, विभिन्न आयोजन और ग्राम सहित आसपास के क्षेत्रों की सहभागिता सुनिश्चित करने पर चर्चा हुई।

 बैठक में मौजूद कार्यकर्ता

बिलासपुर के ग्राम गतौरी में RSS कार्यकर्ताओं की बैठक, शताब्दी समारोह की तैयारी पर चर्चा करते हुए
बिलासपुर के ग्राम गतौरी में RSS कार्यकर्ताओं की बैठक, शताब्दी समारोह की तैयारी पर चर्चा करते हुए

बैठक में सुरेंद्र पाण्डेय, दिनेश सिंह, रामनाथ सूर्यवंशी, रामप्रसाद भार्गव, रामकिशुन यादव,, सूर्यप्रकाश मरकाम (सरपंच गतौरी), रमेश ओग्रे (उप सरपंच गतौरी), मिलाप सिंह, राजा सिंह, बिट्टू सिंह, अनुराग शुक्ला, टिंकू सिंह, गणेश साहू, निखिल शुक्ला, जग्गू मिरी, अजय सिंह, रिंकू, हर्ष सिंह, छोटू सिंह, पवन साहू, पंकज शुक्ला और दीप साहू शामिल हुए।

कार्यकर्ताओं ने निर्णय लिया कि RSS का शताब्दी समारोह गांव-गांव तक जोड़ने वाला एक व्यापक आयोजन होगा, जिसमें सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों को प्राथमिकता दी जाएगी।

SECL : अखिल भारतीय कोयला खदान मजदूर संघ ने बिलासपुर मुख्यालय में सौंपा ज्ञापन

SECL : 17 सूत्रीय मांगों को लेकर गूंजे नारे, प्रबंधन को सौंपा गया पत्र

बिलासपुर। अखिल भारतीय खदान मजदूर संघ के आह्वान पर 12 सितंबर को देशभर के कोयला उद्योगों के क्षेत्रीय मुख्यालयों में धरना-प्रदर्शन और ज्ञापन सौंपने का कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसी क्रम में दक्षिण पूर्वी कोलफील्ड्स लिमिटेड (SECL) मुख्यालय, बिलासपुर में बड़ी संख्या में पदाधिकारी, कार्यकर्ता और ठेका श्रमिक एकत्रित हुए। गेट के सामने जोरदार नारेबाजी और विरोध-प्रदर्शन के बीच संगठन ने केंद्रीय कोयला मंत्री और कोल सचिव के नाम 17 सूत्रीय मांग पत्र सौंपा।

संघ की प्रमुख मांगों में खदान कर्मियों के लिए मूलभूत सुविधाओं की गारंटी, उत्पादन लक्ष्य की होड़ में सुरक्षा और पर्यावरणीय मानकों की अनदेखी पर रोक, आउटसोर्सिंग नीति पर नियंत्रण, ठेका श्रमिकों को हाई पावर कमेटी द्वारा तय वेतन व सामाजिक सुरक्षा लाभ दिलाना शामिल है। इसके अलावा भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन, पेंशन-आवास सुविधा, सिविल कार्यों में पारदर्शिता और श्रमिक संगठनों के साथ नियमित बैठकें आयोजित करने की भी मांग की गई।

इस मौके पर शाखा अध्यक्ष गौरव सिंह, सचिव शंखध्वनि सिंह बनाफर, कार्यकारी अध्यक्ष अजय सिंह, कोषाध्यक्ष सुनील राठौर, संचालन समिति सदस्य गिरजाशंकर आचार्य, आवास समिति सदस्य अनिल दिघ्रस्कर, पूर्व अध्यक्ष अरुण सोनी, अजय दास गुप्ता, शिवेंद्र सिंह, राय चौधरी, शिव साहू, पुरषोत्तम गुप्ता, पूर्व सचिव संदीप बल्लाल समेत कई पदाधिकारी और श्रमिक मौजूद रहे।

कार्यक्रम के अंत में प्रबंधन की ओर से वरिष्ठ प्रबंधक अनंत मिश्रा और प्रबंधक अरुण कुमार ने ज्ञापन ग्रहण किया। भारतीय मजदूर संघ छत्तीसगढ़ के कार्यकारी अध्यक्ष एवं मुख्यालय शाखा सचिव शंखध्वनि सिंह बनाफर ने चेतावनी दी कि यदि मांगों पर शीघ्र निर्णय नहीं लिया गया, तो आंदोलन को कंपनी स्तर से बढ़ाकर कोल इंडिया स्तर तक ले जाया जाएगा।

भले ही जेल जाना पड़े, लेकिन रावण दहन वहीं करेंगे”अरपांचल लोक मंच अध्यक्ष सिद्धांशु मिश्रा का प्रशासन को खुला चैलेंज

बिलासपुर। बिलासपुर छत्तीसगढ़ की न्यायधानी में इस बार दशहरा पर्व पर रावण दहन को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। सरकंडा स्थित साइंस कॉलेज मैदान, जो अब तक अरपांचल लोक मंच समिति के आयोजनों का केंद्र रहा है, वहां इस बार प्रशासन ने किसी और को परमिशन दे दी है। इसी फैसले के बाद मंच के पदाधिकारी भड़क गए हैं और उन्होंने इसे “द्वेषपूर्ण व दबाव की राजनीति” करार दिया है।

अरपांचल लोक मंच समिति के अध्यक्ष सिद्धांशु मिश्रा ने सोमवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए, मिश्रा ने कहा कि मंच कई वर्षों से साइंस कॉलेज मैदान में रावण दहन सहित सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करता आ रहा है, लेकिन इस बार अचानक से मैदान का आवंटन सिद्धार्थ भारती नामक व्यक्ति को कर दिया गया।

मिश्रा का कहना है कि मंच ने समय रहते आवेदन किया था, फिर भी कॉलेज प्रबंधन और प्रशासन ने दूसरे आवेदन को स्वीकार किया। उन्होंने आरोप लगाया कि “प्रशासन और पुलिस दबाव में काम कर रही है और दबाव डालने वाला चेहरा जल्द ही सामने लाया जाएगा।”

सिद्धांशु मिश्रा ने स्पष्ट कहा कि “भले ही जेल जाना पड़े, लेकिन रावण दहन वहीं होगा। हम प्रशासन की एकतरफा कार्रवाई को स्वीकार नहीं करेंगे। आवश्यकता पड़ी तो न्यायालय का दरवाजा खटखटाएंगे और बेलतरा विधायक सुशांत शुक्ला से भी मुलाकात करेंगे।”

अरपांचल लोक मंच समिति ने यह भी सवाल उठाया कि जब एक आवेदन पहले से लिया गया था तो कॉलेज प्रबंधन ने दूसरा आवेदन क्यों स्वीकार किया? मिश्रा ने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन बताया और चेतावनी दी कि अगर प्रशासन अपने निर्णय पर अडिग रहा तो संघर्ष तेज होगा।

अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस विवादित हालात में क्या रुख अपनाता है,क्या परंपरा को जारी रखते हुए अरपांचल लोक मंच को अनुमति देगा, या इस बार मैदान में किसी नए आयोजनकर्ता को बढ़त मिलेगी।

Sarathi Samaj Social Conference : व्यक्ति जन्म से नहीं कर्म से महान होता है – त्रिलोक

Sarathi Samaj Social Conference : बिलासपुर में सहीस सारथी समाज का भव्य सामाजिक सम्मेलन साई मंगलम रमतला में संपन्न हुआ। इस आयोजन में छत्तीसगढ़ प्रदेश भर से हजारों लोगों ने हिस्सा लिया। मुख्य अतिथि कांग्रेस नेता त्रिलोक चंद्र श्रीवास ने कहा कि समाज की प्रगति शिक्षा और शासकीय योजनाओं के बेहतर उपयोग से संभव है।

सहीस सारथी समाज सम्मेलन बिलासपुर 2025
         सहीस सारथी समाज सम्मेलन बिलासपुर 2025

बिलासपुर l कोई व्यक्ति जन्म से छोटा नहीं होता जन्म से सभी व्यक्ति एक समान होते हैं, कर्म और आचरण से व्यक्ति बड़ा होता है, मनुष्यों के सिर्फ एक जाती है वह मानव जाति है, भगवान ने एक ही जाती बनाया है मानव जाति एक समाज बनाया है मानव समाज बनाया है, सनातन संस्कृति में कोई भी जाती छोटी नहीं है, ना कोई व्यक्ति छोटा है, जो हीन भावना से ग्रसित होता है वह दूसरे व्यक्ति या जाति को छोटे रूप से देखता है, या उनके छोटे रूप में आकलन करता है, सारथी समाज भगवान श्री कृष्ण महाभारत में अर्जुन के सारथी बन गए थे, तो कर्म से कुछ समय के लिए भगवान भी योगेश्वर कृष्ण भी सारथी हुए, हर समाज का वैभवशाली इतिहास रहा है समाज के लोगों को बच्चों को युवाओं शिक्षित बनाकर शासकीय योजनाओं को अपनाकर समाज को उत्तरोत्तर प्रगति करना है, यह बातें बिलासपुर जिले के लोकप्रिय कांग्रेस नेता त्रिलोक चंद्र श्रीवास ने सहीस सारथी समाज के सामाजिक सम्मेलन में मुख्य अतिथि के हैसियत के व्यक्त किया, सहिस सारथी समाज का सामाजिक सम्मेलन साई मंगलम रमतला मैं संपन्न हुआ, जिसमें बेल्थरा बिलासपुर सहित पूरे छत्तीसगढ़ प्रांत के हजारों लोग सम्मिलित हुए, इस अवसर पर श्री त्रिलोक श्रीवास् ने कहा कि वह सारथी समाज के हर सुख- दुख में भागीदार बनते आ रहे हैं, भविष्य में भी उनको समाज के लिए कुछ योगदान करने पर गौरवांवित महसूस होगा, इस अवसर पर सारथी समाज के बिलासपुर जिले से पूरे प्रदेश से आए प सामाजिक बंधु, बहने हजारों की संख्या में उपस्थित थे, जिसमें प्रमुख रूप से डॉक्टर प्रेमलाल सारथी, रोशन सागर, गुलाब नागेन्द्र, गुलाब डोंगरे, छोटेलाल सागर कीर्ति सागर तुलाराम कुलदीप लखन लाल सहिस कृष्ण सागर रोहन सागर जय सारथी रामनारायण साहनी शिव कुमार सागर किशोर सागर विनोद सागर संतोष सागर सीमा सागर रामवती बाई लता सारथी, राहुल श्रीवास दुर्गेश पटेल, पार्थ किशन सहित सारथी समाज के हजारों लोग उपस्थित थे l

संस्कृत भारतीय संस्कृति की आत्मा है, इसे नई पीढ़ी तक पहुँचाना होगा : CM साय

Sanskrit Vidwat Sammelan Raipur : CM विष्णुदेव साय ने कहा कि संस्कृत भारतीय संस्कृति की आत्मा है और इसे नई पीढ़ी तक पहुँचाना हमारी जिम्मेदारी है। उन्होंने जोर दिया कि आधुनिक शिक्षा में भी संस्कृत प्रासंगिक है और इसका संरक्षण आने वाली पीढ़ियों के लिए आवश्यक है।

रायपुर। भारतीय संस्कृति की आत्मा संस्कृत में निहित है, जो हमें विश्व पटल पर एक विशिष्ट पहचान प्रदान करती है। संस्कृत भाषा व्याकरण, दर्शन और विज्ञान की नींव है, जो तार्किक चिंतन को बढ़ावा देती है। CM विष्णुदेव साय ने आज राजधानी रायपुर के संजय नगर स्थित सरयूपारीण ब्राह्मण सभा भवन में आयोजित विराट संस्कृत विद्वत्-सम्मेलन को संबोधित करते हुए यह बात कही।

मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि संस्कृत शिक्षा आधुनिक युग में भी प्रासंगिक और उपयोगी है। संस्कृत भाषा और साहित्य हमारी विरासत का आधार हैं, जिन्हें हमें संरक्षित और संवर्धित करना चाहिए।

मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि देववाणी संस्कृत पर चर्चा के साथ यह सम्मेलन भारतीय संस्कृति, संस्कार और राष्ट्र को सुदृढ़ बनाने का एक महान प्रयास है। मुख्यमंत्री श्री साय ने संस्कृत भाषा के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए संस्कृत भारती छत्तीसगढ़ और सरयूपारीण ब्राह्मण सभा छत्तीसगढ़ द्वारा किए जा रहे प्रयासों की सराहना की तथा उन्हें बधाई और शुभकामनाएँ दीं।

मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि आधुनिक शिक्षा में संस्कृत भाषा को शामिल करने से विद्यार्थियों का बौद्धिक विकास सुनिश्चित होगा। संस्कृत में वेद, उपनिषद और पुराण जैसे ग्रंथों का विशाल भंडार है, जो दर्शन, विज्ञान और जीवन-मूल्यों का संदेश देते हैं। वेदों में वर्णित आयुर्वेद, गणित और ज्योतिष आज भी प्रासंगिक हैं और शोध का विषय हो सकते हैं। इन ग्रंथों में कर्म, ज्ञान और भक्ति के सिद्धांत स्पष्ट रूप से प्रतिपादित हैं, जो आधुनिक जीवन में शांति और संतुलन ला सकते हैं।ऐसे में संस्कृत शिक्षा आधुनिक युग में भी उतनी ही प्रासंगिक और उपयोगी है।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि वेदों और उपनिषदों के ज्ञान को अपनाकर हम अपनी विरासत को संजोने के साथ-साथ अपने जीवन को भी समृद्ध बना सकते हैं। उन्होंने कहा कि हमें युवाओं को संस्कृत साहित्य से जोड़ने के लिए प्रेरित करना होगा, ताकि वे इस ज्ञान को नई पीढ़ी तक पहुँचा सकें।

मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि तकनीक के माध्यम से संस्कृत शिक्षा को आकर्षक और प्रासंगिक बनाया जा सकता है। राज्य में संस्कृत विद्वानों और शिक्षकों की सक्रिय भागीदारी से इस दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकते हैं। उन्होंने आह्वान किया कि इस सम्मेलन के माध्यम से हमें संस्कृत विद्या के प्रचार-प्रसार और अगली पीढ़ी को जोड़ने का संकल्प लेना चाहिए।

कार्यक्रम में मुख्यमंत्री श्री साय ने सरयूपारीण ब्राह्मण सभा, छत्तीसगढ़ के प्रचार पत्रक का विमोचन भी किया। विराट संस्कृत विद्वत्-सम्मेलन का आयोजन संस्कृत भारती छत्तीसगढ़ एवं सरयूपारीण ब्राह्मण सभा छत्तीसगढ़ के संयुक्त तत्वावधान में किया गया।

सम्मेलन को संबोधित करते हुए संस्कृत भारती के प्रांताध्यक्ष डॉ. दादू भाई त्रिपाठी ने कहा कि इतिहास में ऐसे अनेक प्रमाण मिलते हैं, जिनसे सिद्ध होता है कि एक समय संस्कृत जनभाषा के रूप में प्रचलित थी। छत्तीसगढ़ी भाषा का संस्कृत से सीधा संबंध है। छत्तीसगढ़ी में पाणिनि व्याकरण की कई धातुओं का सीधा प्रयोग होता है। उन्होंने यह भी बताया कि सरगुजा क्षेत्र में सर्वाधिक आदिवासी विद्यार्थी संस्कृत की शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।

मुख्यमंत्री श्री साय ने कार्यक्रम में सरयूपारीण ब्राह्मण समाज के विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान देने वाले व्यक्तियों को सम्मानित किया। इनमें गठिया रोग विशेषज्ञ डॉ. अश्लेषा शुक्ला, उत्कृष्ट तैराक अनन्त द्विवेदी तथा पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सच्चिदानंद शुक्ला शामिल थे।

सम्मेलन को दंडी स्वामी डॉ. इंदुभवानंद महाराज, सरयूपारीण ब्राह्मण सभा छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष डॉ. सुरेश शुक्ला और अखिल भारतीय संस्कृत भारती शिक्षण प्रमुख डॉ. श्रीराम महादेव ने भी संबोधित किया। इस अवसर पर डॉ. सतेंद्र सिंह सेंगर, अजय तिवारी, बद्रीप्रसाद गुप्ता सहित बड़ी संख्या में संस्कृत शिक्षकगण, सामाजिक प्रतिनिधि और गणमान्यजन उपस्थित थे।

Teachers day : शिक्षक समाज का सर्जक है, इसलिए सदैव सम्मानीय है – राजेश सूर्यवंशी

Teachers day : बिलासपुर जिले के ग्राम सेमरताल स्थित शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में शिक्षक सम्मान समारोह का भव्य आयोजन किया गया। चंदैनी गोंदा सभागार में हुए इस कार्यक्रम में सेवानिवृत्त शिक्षकों से लेकर नवांकुर शिक्षकों तक को सम्मानित किया गया। विशेषता यह रही कि जिन शिक्षकों ने तीन-तीन पीढ़ियों को शिक्षा दी, आज उनकी चौथी पीढ़ी भी शिक्षक बनकर समाज को ज्ञान दे रही है। समारोह में शिक्षा, साहित्य और समाज के विभिन्न क्षेत्रों से आए अतिथियों ने शिक्षकों के योगदान को सराहा और विद्यालय के विकास के लिए सहयोग की घोषणाएं भी कीं।

बिलासपुर/सेमरताल । शासकीय उच्चतर माध्यमिक विघालय सेमरताल के चंदैनी गोंदा सभागार में शिक्षक सम्मान समारोह का भव्य आयोजन किया गया। ग्राम स्तर के इस आयोजन की भव्यता का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि इस कार्यक्रम में नवांकुर शिक्षकों के साथ ही ऐसे सेवानिवृत्त शिक्षकों को आमंत्रित किया गया, जिन्होंने तीन तीन पीढ़ियों को शिक्षा प्रदान की है। इतना ही नहीं आज उन्हीं शिक्षकों के बच्चे शिक्षक बनकर चैंथी पीढ़ी को भी पढा रहे हैं। सेवानिवृत शिक्षक व सियनहा मंच के संस्थापक रामकुमार वर्मा ऐसे ही शिक्षक हैं, जिनके तीन भाईयों ने शिक्षकीय कार्य किया। वही आज उनके आठ बच्चे प्राथमिक, पूर्व माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक विघालय में शिक्षकीय दायित्व का निर्वहन कर रहे हैं।
सेमरताल में आयोजित शिक्षक सम्मान समारोह के मुख्य अतिथि राजेश सूर्यवंशी, विशिष्ट अतिथि पूर्व संयुक्त संचालक शिक्षा एस. के. प्रसाद, मुख्य अभ्यागत मदन सिंह ठाकुर साहित्यकार व वरिष्ठ पत्रकार थे। मंचासीन समस्त आगंतुको ने माँ सरस्वती एवं डा.सर्वपल्ली राधाकृष्णन के चित्र की पूजा के साथ समारोह का औपचारिक शुरुवात किया। विघालय के बच्चों ने सरस्वती एवं स्वागत वंदन का गीत प्रस्तुत किया। शाला प्रबंधन समिति के अध्यक्ष सुरेन्द्र पाण्डेय, प्राचार्य अनिल वर्मा एवं प्रबंधन समिति के सदस्य एवं आयोजन के संयोजक सतीश धीवर ने पुष्पगुच्छ भेंट कर मंचस्थ अतीथियों का स्वागत किया।
सुरेन्द्र पाण्डेय ने स्वागत भाषण देते हुए कहा कि आज के आयोजन में राजनीति, शिक्षा और साहित्य के क्षेत्रों से अभ्यागत आए हुए हैं। ये महासंगम है। साथ ही गाँव के सभी सेवानिवृत शिक्षकों का आगमन हुआ है, जिनका आज सम्मान कर रहे हैं। ये अवसर है, आज के शिक्षकों के प्रति सम्मान प्रदर्शित करने का। इन्होंने कहा कि हमारे क्षणिक आमंत्रण पर आप सब कार्यक्रम में उपस्थित हुए, ये बड़ी बात है। आप सबका स्वागत है।
मुख्य अतिथि राजेश सूर्यवंशी ने कहा कि शिक्षक का सम्मान हमेंशा होता है। वे कभी सेवानिवृत नहीं होते। शिक्षक अपना पूरा जीवन एक छत के नीचे सिर्फ समाज के लिए सर्वश्रेष्ठ नागरिक सर्जन करने में गुजार देता है। यही कारण है कि वे सदैव सम्मानीय है। राजेश सूर्यवंशी ने विघालय के मैंदान समतलीकरण व नाली निर्माण के लिए दस लाख रुपए प्रदान करने की घोंषणा की।
विशिष्ठ अतिथि एस. के. प्रसाद ने प्राचार्य के रुप में अपने पहले कार्य स्थल सेमरताल को प्रणाम किया। उन्होंने कहा कि ग्रामीण बच्चों को बारहवीं के बाद प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए उचित मार्गदर्शन और किताबों की आवश्यकता होती है। क्यों न हम सब मिलकर स्कूल में एक पुस्तकालय स्थापित करें, जहाँ इस गाँव व आसपास के प्रतिभाशाली बच्चे अच्छे से तैयारी कर सके। इस विघालय के प्राचार्य अनिल वर्मा हैं, जो कि स्थानीय है। उनके पास विघालय के लिए पर्याप्त समय भी है। आगे हम सब पुस्तकालय के लिए तैयारी करेंगे।
मुख्य अभ्यागत मदन सिंह ठाकुर ने बेहतरीन परीक्षा परिणाम के लिए कक्षा पाँचवी की शिक्षक शुभा पाण्डेय, कक्षा आठवीं के शिक्षक प्रदीप मुखर्जी, नमिता बेहार शर्मा, कक्षा दसवीं की शिक्षक शैली यादव और कक्षा बारहवीं की शिक्षक सीमा ठाकुर, रुपाली श्रीवास्तव, पदमा द्विवेदी एवं अदिति दुबे को शाल, श्रीफल, कलम भेंट कर सम्मानित किया। मदन सिंह ने स्वयं का लिखा भक्ति गीत भी प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम के संयोजक सतीष धीवर ने समारोह कहा कि सभी शिक्षक विघालय में मन लगाकर अध्यापन कार्य करें और लगातार शिक्षा का स्तर बढ़ाते रहे।
प्राचार्य अनिल वर्मा ने कार्यक्रम के आयोजनकर्ता सुरेन्द्र पाण्डेय, सतीश धीवर और रामावतार यादव, समन्वयक ओमप्रकाश वर्मा को बधाई देते हुए कहा कि समाज, शासन और विघार्थियों को शिक्षकों से बड़ी अपेक्षाएं रहती है। वहीं शिक्षको के प्रति जो सम्मान का भाव होना चाहिए वह कम दिखाई देता है। सम्मान देने वाले ही सम्मान पाते हैं। ऐसे में शिक्षक सम्मान समारोह आयोजनकर्ता ने एक अच्छी शुरुवात की है।
मंचस्थ अतीथियों ने सेवानिवृत शिक्षकों रामकुमार वर्मा, रामकुमार मरकाम, अनुजराम धीवर, यदुनंदन कौशिक, पनाराम धीवर, रामकुमार मानिकपुरी, द्वासीराम धीवर, प्राचार्य अनिल वर्मा, संकुल समनयक ओमप्रकाश वर्मा, प्रधान पाठक शांति तिर्की एवं प्रधान पाठक इंदिरा कश्यप को शाल, श्रीफल, कलम भेंट कर सम्मानित किया।
तत्पश्चात सुरेन्द्र पाण्डेय, सतीश धीवर, अनिल वर्मा एवं किया। सेवानिवृत्त शिक्षकों ने शासकीय उच्चतर माध्यमिक विघालय के समस्त शिक्षकों का सम्मान श्रीफल, शाल और कलम भेंट कर किया। सम्मान प्राप्त करने वालों में व्याख्याता ज्योति साहू, व्यायाम शिक्षक संदीप त्रिपाठी, शिक्षक कीर्तन बंजारे, अनीता बोरकर, सहायक शिक्षक बीना ठाकुर, शशि श्रीवास्तव, नमिता मिश्रा, भूमिका साहू, राधा टंडन, सरस्वती शिशु मंदिर के प्रधानाचार्य रवीन्द्रनाथ गहवई, पूजा लासरे, सानिया सूर्यवंशी, बलराम बासपेयी, देवशरण भार्गव शामिल थे। शिक्षक सम्मान समारोह का सफल संचालन आचार्य रवीन्द्रनाथ गहवई ने किया। आभार प्रदर्शन सुरेन्द्र पान्डेय ने किया।

ASEAN Bharat Tourism Year 2025: पर्यटन कूटनीति में भारत की बड़ी पहल

ASEAN Bharat Tourism Year 2025 के तहत भारत ने वियतनाम में आयोजित इंटरनेशनल टूरिज्म एक्सपो में आईआरसीटीसी के जरिए अपनी वैश्विक उपस्थिति दर्ज कराई। हो ची मिन्ह सिटी में लगे ASEAN-India Pavilion ने भारत की सांस्कृतिक धरोहर, लक्ज़री ट्रेनों और पर्यटन संभावनाओं को दुनिया के सामने पेश किया।

नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2025 को आसियान-भारत पर्यटन वर्ष घोषित किया है। इस पहल का मकसद भारत और आसियान देशों के बीच सांस्कृतिक, आर्थिक और पर्यटन सहयोग को नई दिशा देना** है। इसी कड़ी में भारतीय रेलवे खानपान एवं पर्यटन निगम (IRCTC) ने वियतनाम के हो ची मिन्ह सिटी में आयोजित इंटरनेशनल टूरिज्म एक्सपो (ITE) वियतनाम 2025 में भारत की भागीदारी को ऐतिहासिक रूप से प्रस्तुत किया।

आसियान-भारत पैवेलियन बना आकर्षण का केंद्र

4 से 6 सितंबर 2025 तक सैगॉन एग्ज़िबिशन एंड कन्वेंशन सेंटर (SECC) में आयोजित इस एक्सपो में आईआरसीटीसी ने एक विशेष आसियान-भारत पैवेलियन स्थापित किया। यहां भारत की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर, वेलनेस टूरिज्म, एडवेंचर पैकेज और विश्वस्तरीय लक्ज़री ट्रेनों को प्रदर्शित किया गया।

  • महाराजा एक्सप्रेस
  • गोल्डन चैरीअट
  • बौद्ध सर्किट लक्ज़री ट्रेन
  • मुख्य आकर्षण रहे।

इस पैवेलियन का उद्घाटन हो ची मिन्ह सिटी में भारतीय महावाणिज्यदूत विप्र पांडेय ने किया।

 भारत-आसियान सहयोग को नई गति

आईआरसीटीसी ने विदेश मंत्रालय के सहयोग से PATA Travel Mart 2025 (बैंकॉक) और थाईलैंड में **रोड शो** आयोजित कर भारत-आसियान पर्यटन साझेदारी को मजबूत किया। इन आयोजनों में भारत और आसियान देशों के पर्यटन क्षेत्र के प्रमुख प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। थाईलैंड में भारत के राजदूत नागेश सिंह के नेतृत्व में इस पहल को और गति मिली।

सामूहिक प्रतिनिधित्व और नई साझेदारी

ITE वियतनाम में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व आईआरसीटीसी कर रहा है, जिसमें राज्य पर्यटन बोर्ड, निजी पर्यटन कंपनियाँ और आसियान देशों के अधिकारी शामिल हैं। इस दौरान भारतीय और वियतनामी ट्रैवल एजेंटों, टूर ऑपरेटरों व नीति निर्माताओं के बीच सीधा संवाद हुआ, जिससे नए व्यावसायिक अवसरों और साझेदारियों का मार्ग खुला।

वैश्विक पर्यटन में भारत की मजबूत पहचान

प्रधानमंत्री की यह घोषणा और आईआरसीटीसी की भागीदारी भारत को वैश्विक पर्यटन गंतव्य** के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण साबित हो रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल न केवल क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को बढ़ाएगी, बल्कि भारत-आसियान देशों के बीच **मित्रता, विश्वास और साझा विकास के नए अध्याय खोलेगी।

 

Bhupen Da Jayanti: पीएम मोदी ने कहा– उनका संगीत भारत की आत्मा की आवाज है

Bhupen Da Jayanti: भारत रत्न और महान गायक डॉ. भूपेन हज़ारिका की जयंती पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भावुक श्रद्धांजलि दी है। उन्होंने कहा कि भूपेन दा का संगीत केवल स्वर नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, एकता और करुणा की आवाज़ है। असम की धरती से निकली यह कालजयी आवाज़ आज भी भारत की सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखे हुए है। मोदी ने याद दिलाया कि भूपेन हज़ारिका ने अपनी रचनाओं से गरीबों, मज़दूरों और आमजन की भावनाओं को स्वर दिया और उनकी प्रतिभा ने पूरे भारत को जोड़ने का काम किया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी – भारतीय संस्कृति और संगीत से लगाव रखने वालों के लिए आज 8 सितंबर का दिन बहुत खास है। और विशेषकर इस दिन के साथ असम के मेरे भाइयों और बहनों की भावनाएं जुड़ी हुई हैं। आज भारत रत्न डॉ. भूपेन हजारिका की जन्म जयंती है। वे भारत की सबसे असाधारण और सबसे भावुक आवाज़ों में से एक थे। ये बहुत सुखद है कि इस वर्ष उनके जन्म शताब्दी वर्ष का आरंभ हो रहा है। यह भारतीय कला-जगत और जन-चेतना की दिशा में उनके महान योगदानों को फिर से याद करने का समय है।
भूपेन दा ने हमें संगीत से कहीं अधिक दिया। उनके संगीत में ऐसी भावनाएं थीं जो धुन से भी आगे जाती थीं। वे केवल एक गायक नहीं थे, वे लोगों की धड़कन थे। कई पीढ़ियां उनके गीत सुनते हुए बड़ी हुईं। उनके गीतों में हमेशा करुणा, सामाजिक न्याय, एकता और गहरी आत्मीयता की गूंज है।
भूपेन दा के रूप में असम से एक ऐसी आवाज़ निकली जो किसी कालजयी नदी की तरह बहती रही। भूपेन दा सशरीर हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी आवाज आज भी हमारे बीच है। वो आवाज आज भी सीमाओं और संस्कृतियों से परे है। उसमें मानवता का स्पर्श है।
भूपेन दा ने दुनिया का भ्रमण किया, समाज के हर वर्ग के लोगों से मिले, लेकिन वे असम में अपनी जड़ों से हमेशा जुड़े रहे। असम की समृद्ध मौखिक परंपराएं, लोकधुनें और सामुदायिक कहानी कहने के तरीकों ने उनके बचपन को गढ़ा। यही अनुभव उनकी कलात्मक भाषा की नींव बने। वे असम की आदिवासी पहचान और लोगों के सरोकार को हर समय साथ लेकर चले।
बहुत छोटी उम्र से उनकी प्रतिभा लोगों को नजर आने लगी। केवल पांच वर्ष की उम्र में उन्होंने सार्वजनिक मंच पर गाया। वहां लक्ष्मीनाथ बेझबरुआ जैसे असमिया साहित्य के अग्रदूत ने उनके कौशल को पहचाना। किशोरावस्था तक पहुंचते-पहुंचते उन्होंने अपना पहला गीत रिकॉर्ड कर लिया।
लेकिन संगीत उनके व्यक्तित्व का सिर्फ एक पहलू था। भूपेन दा भीतर से एक बौद्धिक व्यक्तित्व थे। जिज्ञासु, साफ बोलने वाले, दुनिया को समझने की अटूट चाह रखने वाले। ज्योति प्रसाद अग्रवाला और विष्णु प्रसाद रभा जैसे सांस्कृतिक दिग्गजों ने उनके मन पर गहरा प्रभाव डाला, और उनकी जिज्ञासु प्रवृत्ति को और बढ़ावा दिया।
सीखने की यही लगन उन्हें कॉटन कॉलेज, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय तक ले गई। वो बीएचयू में राजनीति शास्त्र के छात्र थे, लेकिन उनका अधिकतर समय संगीत साधना में बीतता था। बनारस ने उन्हें पूरी तरह संगीत की तरफ मोड़ दिया। काशी का सांसद होने के नाते मैं उनकी जीवन यात्रा से एक जुड़ाव महसूस करता हूऔर मुझे बहुत गर्व होता है।
काशी से आगे बढ़ी जीवन यात्रा में फिर उन्होंने अमेरिका में कुछ समय बिताया। वहां उन्होंने अपने समय के नामचीन विद्वानों, विचारकों और संगीतकारों से संवाद किया। वे पॉल रोबसन से मिले, जो दिग्गज कलाकार और सिविल राइट्स नेता थे। रोबसन का गीत “Ol’ Man River” उनके कालजयी गीत ‘बिश्टीरनो परोरे’ की प्रेरणा बना। अमेरिका की पूर्व प्रथम महिला एलेनॉर रूजवेल्ट ने भारतीय लोकसंगीत प्रस्तुतियों के लिए उन्हें गोल्ड मेडल भी दिया।
भूपेन हजारिका, संगीत के साथ ही मां भारती के भी सच्चे उपासक थे। भूपेन दा के पास अमेरिका में रहने का विकल्प था, लेकिन वे भारत लौट आए और संगीत साधना में डूब गए। रेडियो से लेकर रंगमंच तक, फिल्मों से लेकर एजुकेशनल डॉक्यूमेंट्री तक, हर माध्यम में वे पारंगत थे। जहां भी गए, नई प्रतिभाओं को समर्थन दिया।
भूपेन दा की रचनाएं काव्यात्मक सौंदर्य से भरी रहीं, और साथ-साथ उन्होंने सामाजिक संदेश भी दिए। गरीबों को न्याय, ग्रामीण विकास, आम नागरिक की ताकत, ऐसे अनेक विषय उन्होंने उठाए। उनके गीतों ने नाविकों, चाय बागान के मजदूरों, महिलाओं, किसानों की आकांक्षाओं को आवाज़ दी। उनकी रचनाएं लोगों को पुरानी स्मृतियों में ले जाती थीं, साथ ही, उन्होंने आधुनिकता को देखने का एक सशक्त नजरिया भी दिया। बहुत से लोग, खासकर सामाजिक रूप से वंचित तबकों के लोग, उनके संगीत से शक्ति और आशा पाते रहे…और आज भी पा रहे हैं।
भूपेन दा की जीवन यात्रा में ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना का स्पष्ट प्रभाव दिखता है। उनकी रचनाओं ने भाषा और क्षेत्र की सीमाएं तोड़कर एकजुट किया। उन्होंने असमिया, बांग्ला और हिन्दी फिल्मों के लिए संगीत रचा। उनकी आवाज में जो पीड़ा थी, वो बरबस हम सभी का ध्यान खींच लेती थी। ‘दिल हूम हूम करे’ में जो पीड़ा बहती है, वो सीधे दिल की गहराइयों को छू लेती है। और जब वे पूछते हैं, ‘गंगा बहती है क्यूं’, तो ऐसा लगता है मानो हर आत्मा को झकझोर कर जवाब मांग रहे हों।
उन्होंने पूरे भारत के सामने असम को सुनाया, दिखाया, महसूस कराया। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि आधुनिक असम की सांस्कृतिक पहचान को गढ़ने में उनका बड़ा योगदान रहा। असम के भीतर और दुनिया भर के असमिया प्रवासियों, दोनों के लिए वो असम की आवाज बने।
भूपेन दा राजनीतिक व्यक्ति नहीं थे, फिर भी जनसेवा की दुनिया से जुड़े रहे। 1967 में वे असम के नौबोइचा से निर्दलीय विधायक चुने गए। यह दिखाता है कि लोगों को उन पर कितना गहरा विश्वास था। उन्होंने राजनीति को अपना करियर नहीं बनाया, लेकिन हमेशा लोगों की सेवा में जुटे रहे।
भारत की जनता और भारत सरकार ने उनके योगदान का सम्मान किया। उन्हें पद्मश्री, पद्मभूषण, पद्मविभूषण, दादासाहेब फाल्के अवार्ड समेत कई सम्मान मिले। 2019 में हमारे कार्यकाल के दौरान उन्हें भारत रत्न मिला। यह मेरे लिए और एनडीए सरकार के लिए भी सम्मान की बात थी। दुनिया भर में, खासकर असम और उत्तर-पूर्व के लोगों ने, इस अवसर पर खुशी जताई। यह उन सिद्धांतों का सम्मान था, जिन्हें भूपेन दा दिल से मानते थे। वो कहते थे कि सच्चाई से निकला संगीत किसी एक दायरे में सिमट कर नहीं रहता। एक गीत लोगों के सपनों को पंख लगा सकता है, और दुनिया भर के दिलों को छू सकता है।
मुझे 2011 का वह समय याद है जब भूपेन दा का निधन हुआ। मैंने टीवी पर देखा, उनके अंतिम संस्कार में लाखों लोग पहुंचे। हर आंख नम थी। जीवन की तरह, मृत्यु में भी उन्होंने लोगों को साथ ला दिया। इसलिए उन्हें जलुकबाड़ी की पहाड़ी पर ब्रह्मपुत्र की ओर देखते हुए अंतिम विदाई दी गई, वही नदी जो उनके संगीत, उनके प्रतीकों और उनकी स्मृतियों की जीवनरेखा रही है। अब ये देखना बहुत सुखद है कि असम सरकार भूपेन हजारिका कल्चरल ट्रस्ट के कार्यों को बढ़ावा दे रही है। यह ट्रस्ट युवा पीढ़ी को भूपेन दा की जीवन यात्रा से जोड़ने में जुटा है।
भूपेन दा की सांस्कृतिक विरासत को सम्मान देने के लिए देश के सबसे बड़े पुल को भूपेन हजारिका सेतु नाम दिया गया। 2017 में जब मुझे इस सेतु के उद्घाटन का अवसर मिला, तो मैंने महसूस किया कि असम और अरुणाचल…इन दो राज्यों को जोड़ने वाले, उनके बीच की दूरी कम करने वाले इस सेतु के लिए भूपेन दा का नाम सबसे उपयुक्त है।
भूपेन हजारिका का जीवन हमें करुणा की शक्ति का एहसास कराता है। लोगों को सुनने और अपनी मिट्टी से जुड़े रहने की सीख देता है। उनके गीत आज भी बच्चों और बुजुर्गों, दोनों की ज़ुबान पर हैं। उनका संगीत हमें माननीय और साहसी बनना सिखाता है। वह हमें अपनी नदियों, अपने मजदूरों, अपने चाय बागान के कामगारों, अपनी नारी शक्ति और अपनी युवा शक्ति को याद रखने को कहता है। वह हमें विविधता में एकता पर भरोसा करने के लिए प्रेरित करता है।
भारत भूपेन हजारिका जैसे रत्न से धन्य है। जब हम उनके शताब्दी वर्ष का आरंभ कर रहे हैं, तो आइए यह संकल्प लें कि उनके संदेश को दूर-दूर तक पहुंचाएंगे। यह संकल्प हमें संगीत, कला और संस्कृति के लिए और काम करने की प्रेरणा दे, नई प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करे, भारत में सृजनात्मकता और कलात्मक उत्कृष्टता को बढ़ावा दे। मेरी बहुत-बहुत शुभकामनाएं।