समाजवाद, अहिंसा और लोककल्याण के अग्रदूत श्री श्री 1008 श्री अग्रसेन जी महाराज की 5149वीं जयंती पर विशेष

विगत कई दशकों से बिलासपुर, बिल्हा, कोटा, अकलतरा जैसे छत्तीसगढ़ के सभी छोटे बड़े कस्बों में आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को श्री श्री 1008 श्री अग्रसेनजी महाराज की जयंती धूमधाम से मनाई जाती हैं। इस वर्ष 31 अगस्त 2025 को जिलाधीश श्री संजय अग्रवाल ने बिलासपुर शहर में वृक्षारोपण एवं जल संचयन कार्यक्रम से श्री अग्रसेन जयंती समारोह का श्रीगणेश किया। रक्तदान, गौ माता सेवा, खेलकूद प्रतियोगिता जैसे पचासों कार्यक्रमो के उपरांत 22 सितंबर 2025 को समाजवाद, अहिंसा और लोककल्याण के अग्रदूत श्री श्री 1008 श्री अग्रसेन जी महाराज की 5149वीं जयंती धूमधाम से मनाई जाएगी। श्री अग्रसेन जी महाराज की जीवनी पर प्रकाश डालते हुए ललित अग्रवाल ने बताया कि भारत भूमि में समय समय अनेकों महापुरुष अवतरित हुए है। महाराज अग्रसेन भारतीय सभ्यता के उन चिरस्थायी आदर्शों में से एक हैं, जिन्होंने समाज में समानता, अहिंसा और समुचित वितरण की भावना को जन्म दिया। युगाब्द से 22 वर्ष पूर्व ( ईसापूर्व 3124 ) द्वापर युग के अंतिम चरण में आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को प्रतापनगर में सूर्यवंशी भगवान श्रीराम के बेटे कुश की 34वीं पीढ़ी के वंशज क्षत्रिय राजा वल्लभसेन व माता भगवतीदेवी के घर अग्रसेनजी का जन्म हुआ था। 15 वर्ष की आयु में अपने पिता राजा वल्लभसेन के साथ पांडवों की तरफ से कौरवों से महाभारत का युद्ध करते समय 10वे दिन भीष्म पितामह के बाणों से राजा वल्लभसेन को वीरगति मिलने से अग्रसेनजी प्रतापनगर के महाराज बनाये गये थे. नागकुमारी माधवी से विवाह कर उन्होंने द्वापर युग में 7 वर्षों तक प्रतापनगर में राज किया. द्वापर से कलयुग के परिवर्तन पर जब भगवान श्री कृष्ण ने अपना शरीर त्याग किया था, तब 22 वर्षीय महाराज श्री अग्रसेन ने वर्तमान हरियाणा के अग्रोहा में सरस्वती नदी के तट पर नए राज्य की स्थापना कर 101 वर्षों तक राज करने के उपरांत कुलदेवी महालक्ष्मी से परामर्श करके अपने ज्येष्ठ पुत्र विभु को शासन सौंपकर तपस्या करने चले गए और वानप्रस्थ आश्रम में तपस्या के दौरान भौतिक शरीर का परित्याग किया. उन्हें व्यापार, कृषि और समानता पर आधारित व्यवस्था लागू करने हेतु याद किया जाता है. एकबार अकाल पड़ने पर वे वेश बदल कर राज्य भ्रमण के दौरान चार सदस्यों के परिवार में गये. जो भोजन करने ही वाले थे कि अतिथि को देखकर चारो ने अपनी अपनी थाली से एक अंश निकाल कर अतिथि को परोसा. इसी से प्रेरणा लेकर महाराज अग्रसेन ने ‘एक ईंट और एक रुपया’ की नीति से समाज में नवआगंतुकों को आत्मनिर्भर बनाकर सामूहिक सहयोग और सामाजिक सुरक्षा की मिसाल पेश की। उस समय समाज जाति व अस्पृश्यता विहीन था तथा एक कुल से दुसरे कुल में स्वयंवर द्वारा योग्य वर का चयन कर विवाह सम्पन्न होते थे. क्षत्रिय होते हुए भी उन्होंने यज्ञों में पशु बलि का विरोध करते हुए अहिंसा का मार्ग चुना और राज्य की समृद्धि के लिए हिंसा- रहित अग्रवंश ( वैश्य वर्ग ) खड़ा किया। महाराजा अग्रसेन ने अपने राज्य को 18 जनपदों (गणराज्य/राज्यांश) में विभाजित किया था और प्रत्येक गणराज्य के प्रशासनिक प्रमुख को उन्होंने अपने पुत्रवत माना था. महाराजा अग्रसेन ने अपने राज्य में लोकतांत्रिक प्रणाली की नींव भी रखी थी, जहाँ प्रत्येक जनपद से एक-एक प्रतिनिधि लेकर प्रशासन का संचालन होता था. प्रत्येक जनपद के अपने अपने गुरु थे जो ऋषि थे, वही आगे चल कर अग्रकुल कहलाए और उनके गोत्र उनके ऋषियों से ही बने.

गणराज्य प्रमुख गोत्र नाम महर्षि जी का नाम

1.विभु – गर्ग गोत्र – महर्षि गर्गाचार्य
2.भीमदेव – गोयल गोत्र – महर्षि गोभिल
3.शिवजी – गोयन गोत्र – महर्षि गौतम
4.सिद्धदेव – बंसल गोत्र – महर्षि वत्स
5.बासुदेव – कंसल गोत्र – महर्षि कौशिक
6.बालकृष्ण – सिंघल गोत्र – महर्षि शांडिल्य
7.धर्मंनाम – मंगल गोत्र – महर्षि मंडव्य
8.अर्जुन – जिंदल गोत्र – महर्षि जैमिन
9.रणकृत – तुंगल गोत्र – महर्षि तांड्य
10.गुप्तनाम – ऐरन गोत्र – महर्षि और्व
11.पुष्पदेव – धारण गोत्र – महर्षि धौम्य
12.माधोसेन – मधुकुल गोत्र – महर्षि मुदगल
13.केशवदेव – बिंदल गोत्र – महर्षि वशिष्ठ
14.भुजमान – मित्तल गोत्र – महर्षि मैत्रेय
15.कंवलदेव – कुच्छल गोत्र – महर्षि कश्यप
16.गुणराज – नांगल गोत्र – महर्षि नगेन्द्र
17.वासगी – भंदल गोत्र – महर्षि भारद्वाज
18.शिवजीभान – तायल गोत्र – महर्षि तैलंग

उक्त 18 गोत्र मूल ऋषियों के नामों पर आधारित हैं, जो अग्रवाल समाज की पहचान हैं. विचारणीय प्रश्न यह भी है कि यदि महाराजा श्री अग्रसेन जी के 18 पुत्र थे. तब तो सभी अग्रवाल आपस में पितृकुल से जुड़े भाई बहन हो जायेंगे तो अग्रवाल आपस में विवाह सम्बंध कैसे कर सकते है. संभव है कि हम सब महाराजा श्री अग्रसेन जी के आदर्शो पर चलने वाले भिन्न भिन्न जनसमूह से हो. लोकतांत्रिक शासन, न्यायप्रिय नीति, आर्थिक समानता और शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी सुविधाएँ हर नागरिक के लिए सुलभ कराने वाले अग्रसेनजी ने अपने समय में प्रजाहित को सर्वोपरि स्थान दिया। महाराज अग्रसेन के नेतृत्व में अग्रोहा राज्य व्यापार, सामाजिक समन्वय, धर्म, न्याय और समृद्धि का केंद्र बन गया था। महाराज अग्रसेन के नाम से देशभर में अस्पताल, विद्यालय, सामुदायिक भवन, धर्मशालाएँ संचालित हैं, जो उनके लोकहितकारी दृष्टिकोण का जीवंत उदाहरण हैं।
उनकी 5100 वीं जयंती के पावन अवसर पर 1976 में भारत सरकार द्वारा, 2016 में मालदीव द्वारा तथा 2017 में भारतीय डाक विभाग द्वारा अग्रसेन की बावली पर एक स्मारक डाक टिकिट जारी किये गये है. छत्तीसगढ़ सहित अनेक राज्य-सरकारों द्वारा उनके आदर्शो को स्वीकार कर उनके नाम पर प्रतिवर्ष रु. दो लाख से अधिक नगद पुरस्कार प्रदान किये जा रहे है. महाराज अग्रसेन न सिर्फ एक कालजयी शासक थे, बल्कि समता, उदारता व अहिंसा के ऐसे अनुकरणीय आदर्श हैं, जिनकी प्रेरणा आज भी सामाजिक उत्थान और सद्भाव की धुरी बनी हुई है। हर वर्ष हम अग्रसेन जयंती मनाते है, लेकिन अग्रकुल संस्थापक के इतिहास को अगली पीढ़ी तक नहीं पहुचा पाते है. कार्तिक अमावस्या को दीपावली,  फाल्गुन पूर्णिमा को होली, चैत्र शुक्ल तेरस को महावीर जयंती,  कार्तिक पूर्णिमा को गुरुनानक जयंती,  चैत्र शुक्ल नवमी को रामनवमी,  भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को जन्माष्टमी और आश्विन माह शुक्ल प्रतिपदा को श्री अग्रसेन जयंती इस बात के द्योतक हैं कि हमारे सभी व्रत त्यौहार तिथि आधारित हैं ना कि ग्रेगोरियन कलेंडर के दिनांक आधारित। इन्ही त्रुटियों को दूर करने हेतु देश के जानेमाने हिंदू चिंतक एवं विचारक अग्रकुल के ही सुनील गंगाराम गर्ग द्वारा संपादित व ललित हीरालाल गर्ग के बिलासपुर आवास से हिंदू दैनंदिनी न्यास द्वारा नववर्ष चैत्र प्रतिपदा युगाब्द 5127 के पावन अवसर पर बिलासपुर से विगत पांच वर्षो से लगातार हिंदू दैनंदिनी प्रकाशित कर अग्रवंश सहित हिंदु समाज को वास्तविकता से अवगत कराने हेतु विश्व में पहली बार हिंदू तिथि को अंको में लिखने की विधि सहित सरल भाषा में तिथि, व्रत, त्यौहार, ऋतु आदि एकसाथ उपलब्ध कराकर हिंदुत्व के विलुप्त होते सद्गुणों को सहेजने व नई पीढीयों को अपने वैभवशाली इतिहास से अवगत कराने हेतु उद्यम किया जा रहा है.

श्री श्री 1008 श्री महाराजा अग्रसेन जी की विशेषताए

दो युगों के दृष्टा : द्वापर के अंत से लेकर कलयुग में भी राज
जाति विहीन समाज : सूर्यवंशी होकर नागवंशी से विवाह
अहिंसा : पशुबलि/मांसाहार का त्याग कर शाकाहार अपनाया
वर्ण परिवर्तन : क्षत्रिय वर्ण को त्याग शुद्ध सात्विक वैश्य वर्ण अपनाया
समाजवाद : समाज से नवआगंतुकों को एक ईंट और एक रुपया दिलवाकर समकक्ष बनाना
धर्मार्थ कार्य : आमदनी का निश्चित हिस्सा धर्मार्थ समाज को वापस करना
समाजसेवा : उस दौर में वृक्षारोपण, कुएं, बावड़ी, धर्मशालाओ का निर्माण
गोत्र व्यवस्था : 18 पुत्रों को यज्ञ कर 18 ऋषियों के मूल गोत्र दिलवाना
सर्वाधिक न्यायपूर्ण राज : 7 वर्षों तक द्वापर युग में तथा 101 वर्षों तक कलयुग में कुल 108 वर्षों न्यायपूर्ण राज करने वाले एकमात्र शासक

उपरोक्त विशेषताओं को ध्यान रखते हुए उनके वंशज (स्टेक होल्डर) होने के नाते आज हमें जाति व्यवस्था का त्याग कर केवल गोत्र उपयोग करना ना केवल ज्यादा प्रासंगिक होगा, अपितु समग्र हिंदू समाज के उत्थान में सहायक होकर पुरुष/महिला के अनुपात की कमी को दूर कर सभी के विवाह सम्बंध में सहायक भी होगा. उनकी 5149वीं जयंती पर हिंदू समाज में व्याप्त बुराइयों का त्याग कर उपरोक्त महर्षियों के गोत्र उपनाम अपनाकर जाति विहीन समरस समाज बनाकर उनके आदर्शो को अपनाना हीं उनके प्रति सही सम्मान होगा. यदि आपके मन में जाति व्यवस्था के अस्तित्व में आने के कारण, अस्पृश्यता के कारण, हिंदुत्व के वैज्ञानिक सद्गुण व काल गणना से सम्बन्धित कोई प्रश्न हो तो निसंकोच सम्पर्क करे यथासम्भव निराकरण करने का प्रयास किया जायेगा.

Pitambara Peeth : श्रावण मास के अंतिम मंगलवार को मंगला गौरी व्रत से मिलती है माता पार्वती की कृपा

बिलासपुर। Pitambara Peeth : पीताम्बरा पीठ त्रिदेव मंदिर में सावन महोत्सव श्रावण मास मे महारुद्राभिषेकात्मक महायज्ञ नमक चमक विधि द्वारा निरंतर किया जा रहा हैं।11 जुलाई 2025 से आरंभ सावन के अवसर पर त्रिदेव मंदिर में महारुद्राभिषेकात्मक महायज्ञ का आयोजन किया जा रहा हैं। यह आयोजन 9 अगस्त सावन शुक्ल पूर्णिमा तक निरंतर चलेगा। इस अवसर पर नित्य प्रतिदिन प्रातः 9:00 बजे से दोपहर 1:30 बजे तक श्री शारदेश्वर पारदेश्वर महादेव का महारुद्राभिषेक नमक चमक विधि से किया जा रहा है। इसी कड़ी पर सावन मास का अंतिम सोमवार धूमधाम से मनाया गया।

पीतांबरा पीठाधीश्वर आचार्य डॉ. दिनेश जी महाराज ने कहा कि सावन में केवल सोमवार का ही नहीं बल्कि मंगलवार के दिन का भी विशेष महत्व है। सावन मास के हर मंगलवार को मंगला गौरी का व्रत किया जाता है। मंगला गौरी व्रत विशेष रूप से विवाहित स्त्रियों द्वारा सौभाग्य (सुपतित्व), पति की दीर्घायु और गृह-सुख की वृद्धि के लिए किया जाता है, वहीं कुंवारी कन्याएं मनवांछित वर प्राप्त करने के लिए यह व्रत करती हैं,शास्त्रों और पुराणों में इसका विशेष महत्व बताया गया है,मंगला गौरी का व्रत करने से सभी दुख व कष्ट दूर होते हैं और मां गौरी की कृपा से परिवार में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है,मंगला गौरी व्रत माता पार्वती (मां गौरी) को समर्पित होता है और मुख्य रूप से वैवाहिक जीवन की सुख-शांति, समृद्धि और पति की लंबी आयु के लिए किया जाता है।इस व्रत को करने से मां गौरी का आशीर्वाद प्राप्त होता है, जिससे वैवाहिक जीवन में प्रेम, विश्वास और आनंद बना रहता है. साथ ही घर में सुख-शांति, ऐश्वर्य और संतान की प्राप्ति का योग भी बनता है। वहीं कुंवारी कन्याओं के लिए जल्द विवाह के योग भी बनते हैं।
विवाह के लिए मंगला गौरी व्रत मां गौरी (पार्वती) को अखंड सौभाग्य की देवी कहा गया है और उन्होंने स्वयं भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तप किया था,यही कारण है कि विवाह की इच्छुक कन्याएं मां गौरी का व्रत करती हैं।सावन के हर मंगलवार को यह व्रत रखा जाता है,अविवाहित कन्याएं अच्छे वर की प्राप्ति और शीघ्र विवाह के लिए इस व्रत को करती हैं, ऐसा माना जाता है कि यदि श्रद्धा से यह व्रत रखा जाए, तो मां गौरी गुणवान, स्थिर और सच्चे जीवनसाथी का वरदान देती हैं।

इसी कड़ी में शारदेश्वर पारदेश्वर महादेव के महारुद्राभिषेक में देवेंद्र मिश्रा आराधना मिश्रा रुद्राक्ष मिश्रा उपस्थित हो पूजन कर पुण्य लाभ प्राप्त किए।

pitambara peeth : त्रिदेव मंदिर में महारुद्राभिषेकात्मक महायज्ञ का आयोजन किया जा रहा

बिलासपुर। pitambara peeth : श्री पीताम्बरा पीठ त्रिदेव मंदिर में सावन महोत्सव श्रावण मास मे महारुद्राभिषेकात्मक महायज्ञ नमक चमक विधि द्वारा प्रारंभ हो गया है जोकि निरंतर एक माह तक चलेगा। 11 जुलाई 2025 से आरंभ सावन के अवसर पर त्रिदेव मंदिर में महारुद्राभिषेकात्मक महायज्ञ का आयोजन किया जा रहा हैं। यह आयोजन 9 अगस्त सावन शुक्ल पूर्णिमा तक निरंतर चलेगा। इस अवसर पर नित्य प्रतिदिन प्रातः 9:00 बजे से दोपहर 1:30 बजे तक श्री शारदेश्वर पारदेश्वर महादेव का महारुद्राभिषेक नमक चमक विधि से किया जा रहा है।

इसी कड़ी में पीताम्बरा पीठाधीश्वर आचार्य डॉ. दिनेश महाराज ने कहा कि समत्व ही शिवत्व है।जीवन प्रतिपल एक नईं चुनौती प्रस्तुत करता है लेकिन जो इन सभी प्रतिकूलताओं अथवा अनुकूलताओं को समभाव से स्वीकार कर लेता है,वही जीवन महान भी बन पाता है।भगवान भोलेनाथ के जीवन की यह सीख बड़ी ही अद्भुत है कि कभी दूध मिला तो प्रसन्न हो गये व कभी केवल पानी ही मिला तो भी प्रसन्न हो गये।कभी शहद अर्पित हुआ तो प्रसन्न हो गये और कभी धतूरा ही मिला तो सहर्ष स्वीकार कर लिया।केवल एक विल्व पत्र पर रीझने वाले भगवान भोलेनाथ जीव को यह सीख देना चाहते हैं,कि जरूरी नहीं कि हर बार उतना ही मिलेगा जितनी आपकी अपेक्षा है कभी-कभी कम मिलने पर भी अथवा जो मिले,जब मिले और जितना मिले उसी में संतुष्ट रहना तो सीखो,तुम आशुतोष बनकर अवश्य पूजे जाओगे।

pitambara peeth : त्रिदेव मंदिर में महारुद्राभिषेकात्मक महायज्ञ का आयोजन किया जा रहा

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इस अवसर पर डॉ. अंकिता पाण्डेय महारुद्राभिषेक एवं पूजन में सम्मिलित रुद्राभिषेक कर पुण्य लाभ प्राप्त किया किए। इस अवसर पर ब्रह्मचारी मधुसूदन पाण्डेय, केसरी नंदन पाण्डेय, पं. चिरंजीवी पाण्डेय, पं. भुवनेश शर्मा, , गौरी पाण्डेय, लक्ष्मी देवी पाण्डेय,अमिता दीपेश पाण्डेय आदि उपस्थित रहे।

hindu dainandini published : धर्मजागरण में बिलासपुर का योगदान अतुलनीय : विनयकांत

बिलासपुर । hindu dainandini published : युगाब्द 5127 / आषाढ़ (पूर्णिमांत श्रावण) कृष्ण नवमी, शनिवार की पावन मंगलबेला में श्रीधाम वृंदावनवासी, मानस मर्मज्ञ, प्रख्यात भजन गायक व कथाकार आदरणीय आचार्य विनयकांत त्रिपाठी महाराज का अंग्रजी तिथिनुसार दिनांक 19 जुलाई 2025 को बिलासपुर रेलवे स्टेशन पर आत्मीय स्वागत किया गया। प्रतिष्ठित समाजसेवी ओमप्रकाश अग्रवाल, मनोज अग्रवाल, बैंकर्स क्लब समन्वयक ललित अग्रवाल, राजेश अग्रवाल, सुनीता अग्रवाल, निशा अग्रवाल सहित बड़ी सँख्या में बिलासपुर के धर्मनिष्ठ श्रद्धालुओं ने महाराजश्री के दर्शन कर आशीर्वाद ग्रहण किया। उन्होंने देश मे शांति, सद्भाव, भाईचारे को बनाये रखने के लिए 100% हिंदुओ के निरापद हिंदूराष्ट्र बनाने हेतु प्रत्येक व्यक्ति से आग्रह व्रत ग्रहण करने का आग्रह किया।

hindu dainandini published : धर्मजागरण में बिलासपुर का योगदान अतुलनीय : विनयकांत

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पांच वर्षों से लगातार नववर्ष पर देश मे पहली बार प्रख्यात हिंदुत्ववादी चिंतक सुनील अग्रवाल द्वारा संपादित एवं हिंदू दैनंदिनी न्यास बिलासपुर से प्रकाशित होने वाली हिंदू दैनंदिनी युगाब्द 5127 की प्रति भेंट की गई। विनयकांत ने आने वाले युग के लिए इस प्रयास को मील का पत्थर बताते हुए आमजनता से इसका अधिकाधिक प्रयोग करने की सलाह दी।

kanwar yatra : सिंधु कांवरिया संघ बाबा बैजनाथ धाम के लिए रवाना

बिलासपुर । kanwar yatra : सिंधु कांवरिया संघ हरिकिशन गंगवानी के नेतृत्व में बाबा बैजनाथ धाम बिलासपुर पटना एक्सप्रेस से रवाना। सावन माह के पवित्र महीने में 30 वर्षों से हरिकिशन गंगवानी के नेतृत्व में 105 किलोमीटर सुल्तानगंज से लेकर देवघर तक कावड़ द्वारा पवित्र गंगाजल लेकर पद यात्रा कर देवघर ज्योतिर्लिंग में अर्पित करते हैं सिंधु कांवरिया संघ के अध्यक्ष हरिकिशन गंगवानी ने बताया कि 1995 से लगातार निरंतर सावन माह में सुल्तानगंज से पवित्र जल लेकर देवघर में पैदल 105 किलोमीटर तारापुर असरगंज मनिया मोड होते हुए देवघर पहुंचते हैं।

kanwar yatra : सिंधु कांवरिया संघ बाबा बैजनाथ धाम के लिए रवाना

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वहां दर्शनीया पहुंचकर संकल्प लेकर ज्योतिर्लिंग बाबा बैद्यनाथ में जल अर्पित करते हैं इस वर्ष सैकड़ो बम एक साथ रवाना हो रहे हैं सिंधु कांवरिया संघ के हरिकिशन गंगवानी नीलम कोटवानी हीरा ग्वालानी नवीन बहारानी तथा रेलवे परिक्षेत्र कांवरिया संघ के मनोज सिंह ठाकुर विनय सिंह तथा टिकरापारा कांवरिया संघ के शुभम सोनकर विनाश सोनकर शुभम पाणिकर शुभम ठाकुर पूर्व पुलिस अधीक्षक सुखदेव सिंह क्रोशिया पूर्व थानेदार के,एस राठिया आदि बिलासपुर पटना एक्सप्रेस से रवाना हुए उक्त जानकारी हरिकिशन गंगवानी द्वारा दी गई ।

brahma kumaris : आध्यात्म से श्रेष्ठ समाज स्थापना हेतु महा संत सम्मेलन

बिलासपुर । brahma kumaris । परिवर्तन सृष्टि का नियम है। और प्रति क्षण परिवर्तन होता ही आ रहा है। प्रकृति और पुरुष का खेल सदा ही चलता रहता है। पुरुष अर्थात आत्माए,.प्रकृति अर्थात शरीर, जैसी आत्मा की क्वालिटी होती है वैसे ही प्रकृति अर्थात सृष्टि में परिवर्तन आता है। यह सृष्टि आदि में सतयुग अर्थात स्वर्णिम काल से युक्त थी। उस समय मानव मन श्रेष्ठ सतोप्रधान था। मानव मन की दिन-प्रतिदिन गिरती कला के कारण मन कमजोर, नकारात्मक हो गया जिससे प्रकृति भी तमो प्रधान बन गई। अब वापस इस सृष्टि को सुख,शांति से संपन्न बनाने के लिए ब्रह्माकमारी के धार्मिक प्रभाग के द्वारा आध्यात्म के द्वारा श्रेष्ठ समाज ‘की स्थापना विषय पर एक महा संत सम्मेलन का आयोजन सिंधू भवन, तोरवा बिलासपुर में दिनांक 13 जुलाई रविवार को संध्या 4:00 बजे रखा गया है।

brahma kumaris : आध्यात्म से श्रेष्ठ समाज स्थापना हेतु महा संत सम्मेलन

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बिलासपुर प्रेस क्लब में पत्रकारों से चर्चा करते हुए ब्रह्माकुमारी राखी दीदी,ब्रह्म कुमार नारायण भाई, आचार्य महामंडलेश्वर कमल किशोर, ब्रह्माकुमारी भारती दीदी कटनी, विनीता भावनानी और आचार्य पुष्पेंद्र ने संयुक्त रूप से बताया कि कार्यक्रम विशेष संतों के
सानिध्य में सपन्न होगा। संतों का जीवन ही प्रेरणादाई होता है और संत प्रेम करुणा दया और ज्ञान के भंडार कहे जाते है, संत हमें मार्गदर्शन देकर जीवन सुखद बनाते है। इस कार्यक्रम के मुख्य वक्ता राजयोगी ब्रम्हकुमार रामनाथ भाई मुख्यालय संयोजक माउंट आबू होंगे। इस कार्यक्रम में अन्य माननीय वक्ता आचार्य महामंडलेबर कमल किशोर जी,अध्यक्ष दिव्य शक्ति अखाडा सहारनपुर, साध्वी प्रज्ञा भारती जी जबलपुर मध्यप्रदेश धार्मिक प्रभाग के, इंदौर मध्य प्रदेश जोनल कोऑर्डिनेटर ब्रह्याकुमार नारायण भाई, स्वामी
परमात्मानंद गिरि पेंड्रा रोड गौरेला,त्यागी प्रेमदास जी महाराज ब्रह्या बाबा मंदिर,ब्रह्माकुमारी लक्ष्मी दीदी कटनी,ब्रह्मा कुमार गोविंद भाई मीडिया प्रभाग माउंट आबू उपस्थित रहेंगे। मानसिक शांति व एकाग्रता की अनुभूति कराने के लिए श्रीमद् भागवत गीता की मुख्य वक्ता ब्रम्हकुमारी भारती बहन का होगा। साथ ही साथ बेलतरा क्षेत्र के पूर्व विधायक रजनीश सिंह एवं बिलासपर नगर की प्रथम नागरिक महापौर पूजा विधानी भी उपस्थित रहेंगे। कार्यक्रम का शुभारंभ से पहले सायं 4:.00 बजे मुंबई से पधारे कलाकारों द्वारा संगीत की प्रस्तुति दी जाएगी। कार्यक्रम का सफल संयोजन ब्रह्यकुमारी राखी बहन, सेवा केंद्र संचालिका रामाग्रीन सिटी के द्वारा होगा। इस कार्यक्रम में
शहर के अनेक पंडित, पुजारी, कथाकार बड़ी संख्या में भाग लेंगे और इनका सम्मान का कार्यक्रम भी रखा गया है।

pitambara peeth : नमकं चमकं चैव पौरुषं सूक्तमेव च।नित्यं त्रयं प्रयुञ्जानो ब्रह्मलोके महीयते : आचार्य डॉ. दिनेश

बिलासपुर । pitambara peeth । सरकंडा स्थित श्री पीतांबरा पीठ त्रिदेव मंदिर में सावन महोत्सव धूमधाम के साथ श्रद्धापूर्वक मनाया जा रहा है। इस अवसर पर श्री शारदेश्वर पारदेश्वर महादेव का महारुद्राभिषेकात्मक महायज्ञ चल रहा है, जिसमें विद्वानों द्वारा प्रतिदिन नमक चमक विधि द्वारा पाठ एवं अभिषेक किया जा रहा है।

पीठाधीश्वर आचार्य डॉ. दिनेश  महाराज ने बताया कि रूद्राभिषेक एक धार्मिक अनुष्ठान है, जो शक्तिशाली मंत्रो के उच्चारण द्वारा किया जाता है। और रुद्राभिषेक पूर्ण रुप से भगवान शिव को समर्पित है, क्योंकि सबसे जल्दी प्रसन्न होने वाले देवता भगवान शिव है। रुद्राभिषेक भी भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए ही किया जाता है। और रुद्राभिषेक मे भागवन शिव के रुद्र अवतार की पूजा और अभिषेक किया जाता है।
रुतम्-दु:खम्,द्रावयति-नाशयतीतिरुद्र: अर्थात रुद्र रूप मे विराजमान भगवान शिव हमारे समस्त प्रकार के दु;खो को शीघ्र ही समाप्त कर देते है। रुद्राभिषेक करने से समस्त प्रकार के कष्टो से मुक्ति मिल जाती है।

नमकं चमकं चैव पौरुषं सूक्तमेव च।नित्यं त्रयं प्रयुञ्जानो ब्रह्मलोके महीयते – pitambara peeth पीठाधीश्वर आचार्य डॉ. दिनेश

वायुपुराण के अनुसार जो रुद्राष्टाध्यायी के नमक(पञ्चम अध्याय) और चमक(अष्टम अध्याय)तथा पुरुष सूक्त का प्रतिदिन तीन बार पाठ करता है वह ब्रह्म लोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है( नमकं चमकं चैव पौरुषं सूक्तमेव च।नित्यं त्रयं प्रयुञ्जानो ब्रह्मलोके महीयते।।)
नमक चमक विधि द्वारा रुद्राभिषेक करने या कराने पर धन, संपत्ति तथा ऐश्वर्या में वृद्धि होती है।जातक को किसी भी प्रकार संकट से मुक्ती मिल जाती है।इसका पाठ करने से अकाल मृत्यु भय का निवारण होता है।आप सभी प्रकार के रोगो से मुक्त हो जाओगे।नमक चमक रुद्राभिषेक के पाठ से वैवाहिक जीवन सुखमय हो जाता है।

इस अवसर पर ब्रह्मचारी मधुसूदन पाण्डेय, पं. चिरंजीवी पाण्डेय, पं. भुवनेश्वर शर्मा, डॉ.अंकिता पाण्डेय, अधिवक्ता अपराजिता पाण्डेय अमिता दीपेश पाण्डेय, चि. केसरी नंदन पाण्डेय, गौरी पाण्डेय, लक्ष्मी देवी पाण्डेय आदि उपस्थित होकर रुद्राभिषेक का लाभ प्राप्त किये।

Shri Pitambara Peeth : रुद्र अर्थात भूतभावन शिव का अभिषेक, शिव और रुद्र परस्पर एक-दूसरे के पर्यायवाची

Shri Pitambara Peeth : पीठाधीश्वर आचार्य डॉ. दिनेश महाराज ने बताया कि रुद्र अर्थात भूतभावन शिव का अभिषेक। शिव और रुद्र परस्पर एक-दूसरे के पर्यायवाची

बिलासपुर । श्री पीतांबरा पीठ त्रिदेव मंदिर सुभाष चौक सरकंडा स्थित श्री शारदेश्वर पारदेश्वर महादेव जीव का महा रुद्राभिषेक नमक चमक विधि द्वारा किया गया, इस अवसर पर प्रतिदिन चार पाठ नमक चमक द्वारा भगवान भोलेनाथ का रुद्राभिषेक प्रातः 9:00 बजे से प्रारंभ होकर दोपहर 1:00 तक चलेगा तत्पश्चात का महाआरती किया जाएगा।सावन के पावन पर्व पर प्रथम दिन भारी मात्रा में श्रद्धालुओं द्वारा जलाभिषेक किया गया। साथ ही नमक चमक विधि द्वारा रुद्राभिषेक में हर्षवर्धन अग्रवाल अधिवक्ता छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट, अदिति अग्रवाल उपस्थित हो महादेव का रुद्राभिषेक किये।

श्री पीतांबरा पीठ में आयोजित गुरु पूर्णिमा महोत्सव में यशवंत शर्मा, प्रिया शर्मा, महिमा जाधव,  संतोष गुप्ता,  संगीता गुप्ता, छाया सिंह, सुपर्णा सिंह आदि श्रद्धालुगणों द्वारा गुरु पूजन किया गया।

Shri Pitambara Peeth : रुद्र अर्थात भूतभावन शिव का अभिषेक, शिव और रुद्र परस्पर एक-दूसरे के पर्यायवाची

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पीठाधीश्वर आचार्य डॉ. दिनेश जी महाराज ने बताया कि रुद्र अर्थात भूतभावन शिव का अभिषेक। शिव और रुद्र परस्पर एक-दूसरे के पर्यायवाची हैं। शिव को ही ‘रुद्र’ कहा जाता है, क्योंकि रुतम्-दु:खम्,द्रावयति-नाशयतीतिरुद्र: यानी कि भोले सभी दु:खों को नष्ट कर देते हैं। हमारे द्वारा किए गए पाप ही हमारे दु:खों के कारण हैं। रुद्रार्चन और रुद्राभिषेक से हमारी कुंडली से पातक कर्म एवं महापातक भी जलकर भस्म हो जाते हैं और साधक में शिवत्व का उदय होता है तथा भगवान शिव का शुभाशीर्वाद भक्त को प्राप्त होता है और उनके सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं। ऐसा कहा जाता है कि एकमात्र सदाशिव रुद्र के पूजन से सभी देवताओं की पूजा स्वत: हो जाती है।

साथ ही पीठाधीश्वर ने कहा प्रत्येक श्रद्धालु को पूजा के दौरान अपनी पहनावें का भी विशेष ध्यान देना चाहिए सदैव पूजा भारतीय परिधान में ही किया जाना चाहिए जैसे माताएं साड़ी एवं पुरुष धोती।

श्री पीताम्बरा पीठ त्रिदेव मंदिर में आषाढ़ गुप्त नवरात्र उत्सव पर विभिन्न धार्मिक आयोजन

बिलासपुर।  सरकण्डा स्थित श्री पीताम्बरा पीठ त्रिदेव मंदिर में आषाढ़ गुप्त नवरात्र उत्सव हर्षोल्लास के साथ धूमधाम से मनाया जा रहा है। पीठाधीश्वर आचार्य डॉ. दिनेश जी महाराज ने बताया कि त्रिदेव मंदिर में नवरात्र के छठवे दिन प्रातःकालीन श्री ब्रह्मशक्ति बगलामुखी देवी का विशेष पूजन श्रृंगार छिन्नमस्ता देवी के रूप में किया जाएगा।

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श्री शारदेश्वर पारदेश्वर महादेव का महारुद्राभिषेक, महाकाली महालक्ष्मी महासरस्वती देवी का षोडश मंत्र द्वारा दूधधारिया पूर्वक अभिषेक किया गया।परमब्रह्म मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम जी का पूजन एवं श्रृंगार किया गया।प्रतिदिन मध्यान्ह कालीन पीताम्बरा हवनात्मक महायज्ञ मे श्री ब्रह्मशक्ति बगलामुखी मंत्र के द्वारा आहुतियाँ दी जा रही है।

पीठाधीश्वर आचार्य डॉ. दिनेश जी महाराज ने बताया कि छिन्नमस्ता दस महाविद्या देवियों में से छठी देवी हैं। इनके एक हाथ में स्वयं का ही कटा हुआ सिर रखा होता है।माता छिन्नमस्ता काली का एक बहुत ही विकराल स्वरूप हैं। हालांकि, इन्हें जीवनदायिनी माना जाता है।छिन्नमस्ता देवी अपने मस्तक को अपने ही हाथों से काट कर, अपने हाथों में धारण करती हैं। मार्कण्डेय पुराण और शिव पुराण के अनुसार, जब देवी ने चण्डी का रूप धरकर राक्षसों का संहार किया था, तो चारों ओर उनका जय घोष होने लगा। परन्तु देवी की सहायक योगिनियाँ जया और विजया की खून की प्यास शान्त नहीं हो पाई थी। इस पर उनकी रक्त पिपासा को शान्त करने के लिए माँ ने अपना मस्तक काटकर अपने रक्त से उनकी रक्त प्यास बुझाई। इस कारण माता को छिन्नमस्तिका नाम से पुकारा जाने लगा। छिन्नमस्तिका देवी को तन्त्र शास्त्र में प्रचण्ड चण्डिका और चिन्तापूर्णी माता जी भी कहा जाता है।एक बार मां पार्वती अपनी दो सहचरियों के साथ भ्रमण पर निकलीं,इस दौरान माता पार्वती की रास्ते में मंदाकिनी नदी में स्नान करने की इच्छा हुई, मां पार्वती ने अपनी सहचारियों से भी स्नान करने को कहा, परंतु दोनों ने स्नान करने से इनकार कर दिया और कहा कि उनको भूख लग रही है,इस पर माता पार्वती ने उनको कुछ देर आराम करने को कहा और स्नान करने चली गईं।मां काफी देर तक स्नान करती रहीं, इसी बीच दोनों सहचरी कहती रही कि उनको भूख लग रही है. लेकिन माता ने दोनों की बात को अनसुना कर दिया,इस पर दोनों सहचरियों ने माता से कहा कि मां तो अपने शिशु का पेट भरने के लिए अपना रक्त तक पिला देती है,परंतु आप हमारी भूख के लिए कुछ भी नहीं कर रही हैं. यह बात सुनकर मां पार्वती को क्रोध आ जाता है और नदी से बाहर आकर खड्ग का आह्वान करके अपने सिर को काट देती हैं, जिससे उनके धड़ से रक्त की तीन धाराएं निकलती हैं दो धाराएं दोनों सहचरियों के मुंह में गिरती हैं,तीसरी धारा मां के स्वयं के मुख में गिरती है, इससे सभी देवताओं के बीच कोहराम मच जाता है।जिसके बाद भगवान शिव कबंध का रूप धारण कर देवी के प्रचंड रूप को शांत करते हैं। तब से मां पार्वती के इस रूप को छिन्नमस्ता माता कहा जाने लगा।

महाशिवरात्रि पर आस्था का केंद्र: यूपी की ‘छोटी काशी’ गोला गोकर्णनाथ का पौराणिक शिव मंदिर

लखीमपुर खीरी। महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर लखीमपुर खीरी के गोला गोकर्णनाथ स्थित पौराणिक शिव मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी है। ‘छोटी काशी’ के नाम से प्रसिद्ध यह मंदिर आस्था का प्रमुख केंद्र माना जाता है। यहां स्थापित अद्भुत शिवलिंग की मान्यता पुराणों और लोक कथाओं में वर्णित है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी 22 फरवरी को यहां पहुंचे और भगवान शिव का जलाभिषेक कर प्रदेश की खुशहाली की कामना की। हरिद्वार और कछला घाट से गंगाजल लाकर भक्त यहां भगवान शिव को अर्पित करते हैं।

भगवान शिव की विचरण स्थली: पौराणिक कथा

गोला गोकर्णनाथ के इस मंदिर को लेकर मान्यता है कि भगवान शिव ने वैराग्य धारण करने के बाद मृग रूप में यहां के वन क्षेत्र में भ्रमण किया था। वराह पुराण के अनुसार, जब ब्रह्मा, विष्णु और इंद्र ने शिव को खोजते हुए यहां आहट की, तो भगवान शिव मृग रूप में भागने लगे। देवताओं ने उनका पीछा कर उनके सींग पकड़ लिए, जिससे सींग तीन भागों में विभाजित हो गया।

  • पहला भाग भगवान विष्णु ने गोला गोकर्णनाथ में स्थापित किया, जिससे इसे ‘गोकर्णनाथ’ नाम मिला।
  • दूसरा भाग ब्रह्मा जी ने बिहार के श्रृंगेश्वर में स्थापित किया।
  • तीसरा भाग इंद्र ने अमरावती में स्थापित किया।

शिव पुराण, वामन पुराण, कूर्म पुराण, पद्म पुराण और स्कंद पुराण में भी इस स्थल का महात्म्य विस्तार से मिलता है।

रावण और गोला गोकर्णनाथ का पौराणिक संबंध

एक अन्य लोक मान्यता के अनुसार, त्रेतायुग में रावण ने भगवान शिव को लंका ले जाने के लिए तपस्या की। भगवान शिव ने शर्त रखी कि उन्हें रास्ते में कहीं भी रखा गया तो वे वहीं स्थापित हो जाएंगे। रावण जब गोला गोकर्णनाथ पहुंचा, तो उसने शिवलिंग एक चरवाहे को थमा दिया और लघुशंका के लिए चला गया।

काफी देर बाद भी रावण के न लौटने पर चरवाहे ने शिवलिंग भूमि पर रख दिया। लौटने पर रावण ने शिवलिंग को उठाने की कोशिश की, लेकिन असफल रहा। क्रोध में आकर रावण ने अपने अंगूठे से शिवलिंग को भूमि में दबा दिया। मान्यता है कि आज भी शिवलिंग पर रावण के अंगूठे का निशान मौजूद है।

शिव मंदिर का विकास और कॉरिडोर निर्माण

वर्ष 2014 में शिव सेवार्थ समिति ने भक्तों के सहयोग से तीर्थ स्थल के मध्य विशालकाय भगवान शिव की प्रतिमा स्थापित कराई थी। वर्ष 2016 में आवास विकास योजना के तहत एक करोड़ 10 लाख रुपये की लागत से मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया। वर्तमान में इस पौराणिक स्थल को शिव मंदिर कॉरिडोर के रूप में विकसित करने की योजना चल रही है, जिससे श्रद्धालुओं को और अधिक सुविधाएं मिल सकेंगी।

जूना अखाड़ा और मंदिर का इतिहास

करीब डेढ़ सदी पहले जूना अखाड़े के नागा साधु इस पौराणिक शिव मंदिर के सर्वराकार हुआ करते थे। वे छत्र लगे हाथियों पर सवार होकर यहां आते थे। बाद में जूना अखाड़ा ने गोस्वामी समाज को मंदिर की देखरेख का दायित्व सौंपा।

हालांकि, मंदिर निर्माण कब और किसने कराया, इसके कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। पहले यह मंदिर गोल मठिया के रूप में छोटा था। वर्तमान में जनार्दन गिरि पौराणिक शिव मंदिर कमेटी के अध्यक्ष हैं और मंदिर की देखरेख कर रहे हैं।

महाशिवरात्रि के अवसर पर गोला गोकर्णनाथ का यह पौराणिक शिव मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था और विश्वास का प्रतीक बना हुआ है।